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पथ की पहचान


समय, काल, देश व परिस्थिति के अनुरूप आध्यात्मिक विधान को आख्यायित करने की परम्परा भारतीय संस्कार का स्वरूप रहा है। पर जो सनातन है, शाश्वत है, उसकी व्याख्या समय की सीमाओं को लांघती हुई कालान्तर के साथ समरूप मे मिल ही जाती है । 
       पतंजलि  का अष्टांग योग और भगवान बुद्ध का मध्यम अष्टांगिक मार्ग तार्किक रूप से एक ही उद्देश्य (अध्यात्म - स्वत: का ज्ञान) को अवधारित करता है। अष्टांग योग- यम, नियम, आसन, प्रणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और फिर समाधि की अवस्था की प्राप्ति- ईश्वरीय स्थिति को भान कराता है, वही भगवान महात्मा बुद्ध का मध्यम न न अष्टांगिक मार्ग भी सम्यक् दृष्टि, सम्यक् श्रवण, सम्यक् वाक्, सम्यक् स्मृति, सम्यक् आजीव, सम्यक् करम, सम्यक् व्यायाम भी — सम्यक समाधि की ओर ही पहुँचाता है।
             अष्टांग योग का यम और नियम मानसिक प्रसन्नता, आसन और प्राणायाम शारीरिक स्वस्थता, प्रत्याहार और धारणा बौद्धिकता तथा ध्यान और समाधि  आध्यात्मिक  उचाई प्रदान करता है। इन सभी भावो का समावेश करते हुए भगवान बुद्ध के अष्टांगिक मार्ग से भी उसी आध्यात्मिक अवस्था को ही प्राप्त होते  है । दोनो चिन्तनों मे साध्य व साधन एक जैसे ही है। 

अध्यात्म तो उसी दिन ज्योतिमय हो गया था, जब अन्तिम यात्रा को देख मन विह्वल हुआ जा रहा था। बोधिसत्व की प्राप्ति तो परिणति थी! साध्य को प्राप्त करने के पथ की पहचान ही आध्यात्मिक प्रवृति का आरम्भन है, तभी पतंजलि भी अष्टांग योग के प्रारम्भ मे यम व नियम के माध्यम से पहले पथ की पहचान को समीचीन एवं आवश्यक बताते है।
     आस्तिक दर्शन भी सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा व वेदान्त के माध्यम से प्रकृति - पुरूष, जीवन - मुक्ति, जड़-चेतन, नीति-अनीति, शिव -शैव और अन्त मे सदगति को ही प्रशस्त करता है। इसलिए विधान  देश, काल व स्थान के अनुसार निर्धारित तो किए गए है, पर ज्ञान-पुंज  एक सा प्रकाशित एवं प्रतिबिम्बित है। बुद्धि  विवेक पूर्ण होकर यथेष्ट निर्णय करे, तभी जीवन का यात्रा - वृतांत सहज, सुगम ओर प्रकाशमान होता है। 
      कलियुग मे कर्म के सिद्धांत को एक बार पुन: परिभाषित एवं स्थापित करने की आवश्यकता आ गई है। युग - युगान्तर से, शास्त्र, वेद, उपनिषद व दर्शन द्वारा निर्धारित सत्कर्म की पहचान करने का समय आ गया है। और समय आ गया है पूर्वजों द्वारा स्थापित परम्पराओं को निभाने का। तभी हम समझ पाएँगे, कि जीवन मूल्यों की परिपाटी पर हम कहाँ से चले थे, कहाँ जाना था और कहाँ पहुँच गए!       
 अत: सम्यक् रूप से सोचना सार्थक और समीचीन होगा —
 “पूर्व  चलने के बटोही, बाट की पहचान कर ले “ .....

“यह जीवन क्या है झरना है,
 मस्ती (अध्यात्म ) ही इसका पानी है “ ....

  “ इस पार प्रिय तो तूम ही हो,
    उस पार न जाने क्या होगा “ .....
              
इसलिए “आलोकित पथ करो हमारा,
 हे युग के  अन्तर्यामी, 
शुभ प्रकाश दो, स्वच्छ दृष्टि दो,
 हे, जड़ - चेतन सबके स्वामी । “....

 “कर्मयोग ही जीवन का आधार है। “
                
मनोज सिंह

मनोज सिंह

A very rare combination of man of laureate and an IPS officer. He has been writing from his heart. Even after his very tight routine, he manages to express his state of heart in the form of garland of words.

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