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पहाड़ों की सरगोशियां


बात केवल अन्तर्मन से सुनने की है। जो आवाज़, जो ध्वनि शान्त पहाड़ों व चट्टानों से निकलती है, जो शब्द की गहराई उनसे नि:सृत ध्वनियों मे है, जड़ता के बीच जो चेतनता है। जिस प्राचीनता को बयां कर रहे होते हैं ये पहाड़ और चट्टान, उसमें निश्चित ही एक कहानी का राज छुपा होता है, जो कभी जीवन का पथ प्रशस्त करता होगा। स्थिर, शान्त, गम्भीर चट्टान जीवन के उन मूल्यों की ओर इंगित करते है, जिससे न केवल अपने आप को सँवारा जा सकता है बल्कि सामाजिक आध्यात्मिक प्रतिमान को भी स्थापित किया जा सकता है ।

    जड़ता के सिद्धान्त ही गतिशिलता के विभिन्न रूपों को परिभाषित करते हैैं। जड़त्व ही गन्तव्य की राह बताता है, समझना बस है तो उसकी ध्वनि को, उसके आवाज़ को जो शुद्ध अन्तर्मन ही श्रवण कर सकता है। अन्तर्मन चेतनता के साथ होता है, अत: जड़ता को समझने के लिए गहन चेतनता होना आवश्यक है। स्पष्ट है जड़ता चेतनता से गूढ़ है, गहन है, रहस्यमय है। तभी तो प्रार्थनीय है -
 “ शुभ प्रकाश दो, स्वच्छ दृष्टि दो,
     जड़-चेतन सबके स्वामी। “ 

परमात्मा के लिए जड़ - चेतन सब एक समान है। इसलिए जो ध्वनि जड़ता मे निहित है, वो हमेशा सार्थक ही होती है। बात केवल चेतनता के साथ उसे समझने की होती है ।


कँपकपाने वाली ठंड ऐसे भी शरीर व मन को स्थिर कर रही थी ,सो चल पड़ा गूढ़ के पास बदावर पहाड़ की चट्टानों को सुनने - समझने , हृदय की गहराइयों मे जाकर उनकी बीती कहानियों को समझने का प्रयास किया , उनके भीतर की झंकृत आवाज़ों को सुनने का प्रयास किया तथा शान्त - चित हो युग - यूगानतर की चेतनता जड़ता मे कैसे परिवर्तित हो जाती है , इस पर शोध के विद्यार्थी की तरह मनन कर चेतन मन को उसकी गहराइयों का आभास कराने लगा, बहुत कुछ समझने का अवसर लगा ।

 बहुत ही अच्छी अनुभूति हुई चट्टानों पर पहुँच कर, ईश्वर से यही विनती करता रहा कि - “शुभ प्रकाश दो, स्वच्छ दृष्टि दो, जड़ - चेतन सबके स्वामी।“ 

 हे ईश्वर, जड़त्व को समझने की शक्ति देना ।
मनोज सिंह

मनोज सिंह

A very rare combination of man of laureate and an IPS officer. He has been writing from his heart. Even after his very tight routine, he manages to express his state of heart in the form of garland of words.

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