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जीवन - डगर -1


रामेश्वरम् मे धीर-गम्भीर समुद्र के सतह पर पंख बिखेरते चहचहाते चिड़ियों को देख मन इस क़दर व्याकुल होता था, मानो ख़ुद आसमान चूम लूं। आख़िर आसमान मे तारे चमकते  कैसे है, चमकते तारो की दुनिया कैसी है, चाँद का रूपहला संसार कैसा है, आसमान की निलिमा क्या है - इन सब सवालों के बीच एक अजीब सी आत्म -विश्वास का एहसास होता था कि एक दिन मैं भी आसमान की ऊंचाई मे चहचहाते चिड़ियों की तरह उड़ान भरूँगा, सफलता के नए आयाम भी स्थापित करूँगा तथा जीवन की सम्पूर्णता को समझने का प्रयास करूँगा। 

              मन मे अप्रतिम सोच लिए लक्ष्य को भेदने के उद्देश्य से सीमित- साधन व कठिनाइयों के साथ अनेक चुनौतियों को पार करता हुआ पढाई की मुक़ाम हासिल की। पढाई पूरी करने के बाद नौकरी की तलाश लाज़िमी थी, अवसर आते ही एक साथ डिफ़ेंस- रिसर्च तथा इंडियन एयर फ़ोर्स की साक्षात्कार का आवेदन दे दिया । 

       मन तो समुद्र की सतह पर उड़ती चिड़ियों को देखकर प्रारम्भ से ही छटपटा रहा था, अत: एयरफ़ोर्स की नौकरी की प्राथमिकता ज़ेहन मे घर कर गई थी । रामेश्वरम से धरती को लाँघता हुआ पहले दिल्ली मे डिफ़ेंस-रिसर्च के लिए साक्षात्कार दिया। फिर मन मे नए उमंग, नए उत्साह लिए एक अजीब-सी आत्म विश्वास के साथ पहुँच गया देहरादून, जहाँ इंडियन एयरफ़ोर्स के इंटरव्यू मे शामिल हुआ। जब सपने साकार होते दिख रहे हो तो मन ऐसे भी उड़ान भरने लगता है, नए ख़्वाब, नई उम्मीद, नई सोच, नए एहसास, कुछ कर गुज़रने के लिए अन्दर से इस क़दर मन को उद्वेलित किए जा रहे थे, मानो सही मे उड़ान भरने का समय आ गया हो, बचपन के ख़यालों की याद ताज़ा होते जा रही थी। मन प्रसन्न हुआ जा रहा था। सफलता तो पास ही थी। नि:संदेह ऐसा लग रहा था।

                    पर पच्चीस लोगों की सूची मे नौवें स्थान पर अपने आप को पाकर सारे सपने चकनाचुर होते देख चित ऐसा वोझिल हुआ। चेहरे पर चिन्ता की लकीरे ऐसे खींच गई , मानो सब कही झूठा तो नहीं है। पर, सत्य तो मालूम ही था कि कुल आठ ही रिक्तियाँ है । अवसर आसमान मे उड़ने का ऐसे हाथो से निकल गया, मानो नियति पर विश्वास करना नासमझी है । 

( क्रमशः )
मनोज सिंह

मनोज सिंह

A very rare combination of man of laureate and an IPS officer. He has been writing from his heart. Even after his very tight routine, he manages to express his state of heart in the form of garland of words.

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