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गीता दर्शन - 28


संदर्भ(context) और पृष्ठभूमि( background) का सम्यक ज्ञान सम्बंधित सिद्धांतों एवं नियमों को एक natural outcome बना देता है और फिर गहराई में जाकर  उस concept को समझ पाना और उसके अनुप्रयोगों (applications) को relate कर पाना एक बिल्कुल ही सहज प्रक्रिया हो जाती है। शिक्षण प्रणाली के इस popular format का अनुसरण करते हुए श्रीमद्भागवत गीता भी अपना पूरा प्रथम अध्याय इसी विवेचना को dedicate करती है, जहाँ महाभारत के युद्ध स्थल से सबसे विराट योद्धा अर्जुन युद्ध से विरत होकर सन्यास धारण करने की बात कह रहा है। गुरु की भूमिका निभाते हुए श्री कृष्ण धीरे-धीरे भिन्न-भिन्न तरीकों से उसे युद्ध के लिए प्रेरित करते जाते हैं, अकर्मण्यता के पथ से नियत कर्म की ओर oriented करते हैं और इस पूरे प्रकरण में गीता की विषय वस्तु का विस्तार होता जाता है।

पर संदर्भ के ऊपर आधारित यही विशिष्टता (specificity) और उस पर आवश्यकता से अधिक stress करना Frankenstein's monster का काम करने लगता है और ज्ञान के universal application और acceptance के मार्ग में बाधक सिद्ध होता  जाता है। सतही स्तर पर सोचने पर इस विशिष्टता को लोग अनिवार्यता में परिवर्तित कर देते हैं और ऐसा मानने लगते हैं की गीता का ज्ञान बिना इन विशिष्ट परिस्थितियों को create किए हुए समझ पाना बहुत ही मुश्किल है। और ऐसी अवधारणाएं जीवन को सही ढंग से जीने की दिशा देने वाले और व्यक्तित्व को संपूर्ण करने वाले ग्रंथ से लोगों को दूर करते जाते हैं।

ऐसी wrongly misplaced विचारधाराएं श्रीमद्भागवत गीता के अध्ययन के लिए निम्न परिस्थितियों को जरूरी मानती है -
" आपके पास अर्जुन जैसी दक्षता या उसके समान पात्रता हो अर्थात आप उस परिस्थिति के मूलनायक हों, तभी गीता का ज्ञान आपके लिए सहायक है।"
" आप आवश्यक रूप से दुखी हैं, हताश हैं और अपनी सामर्थ्य पर भरोसा खो चुके हैं। आपको नहीं लगता कि आप खुद से अपनी परिस्थितियां बदल सकते हैं।"
" आप mentally agitated और intellectually confused वाली  स्थिति मे हैं। आप खुद से निर्णय नहीं ले पा रहे हैं और आपकी जिंदगी संशय और अनिर्णय के बीच में झूल रही है।"
" गीता-ज्ञान समझाने के लिए आप को श्रीकृष्ण सरीखा गुरु चाहिए। जब तक ऐसे गुरु ना मिले तब तक इस ग्रंथ को पढ़ने का कोई मतलब नहीं है।"
"जब तक जीवन के समक्ष बहुत बड़ा प्रश्न ना आया हो, अर्थात महाभारत के युद्ध जैसी परिस्थितियाँ निर्मित ना हुई हो, तब तक गीता का ज्ञान प्राप्त करना व्यक्ति के  लिए जरूरी नहीं है।"

उपर्युक्त सारे तर्क भले ही बुद्धिजीवियों को प्रभावित कर ले, किसी debate  में आपको विजेता भी बना दे, पर गीता की मूल अवधारणाओं से वह कोसों दूर हैं। इस ग्रंथ की आत्मा ही all-inclusive है; इसमें सभी के लिए हर परिस्थितियों में कुछ न कुछ है। कर्म योग का मूल सिद्धांत इसके साथ जुड़ा है- 

"नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते |
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ||" (2:40)

ऐसे प्रयत्नों में कभी बीज का नाश नहीं होता। आपके प्रयत्न सदा कायम रहते हैं, जुड़ते रहते हैं और कभी adverse reult नहीं मिलता। धीरे-धीरे किया हुआ छोटा-छोटा प्रयास भी बड़े फलों की ओर अग्रसर करता जाता है। 

Shrawan Singh

Shrawan Singh

An engineer(IITian) by qualification, educationist by profession and mythologist by passion. He fathoms up to the deeper roots of mythological stories and wisdom enshrined in our Sanatana dharma texts like Vedas, Puranas, Epics and specially Gita. He is a naturally gifted speaker and enthrall the audience with the waves of his rhythmic intonation and way of story-telling.

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