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गीता दर्शन- 27


श्रीमद्भागवत गीता को लेकर दुनिया में दो तरह की विचारधाराएं  प्रचलित है और suprisingly दोनों एक दूसरे से बिल्कुल विपरीत। अधिकांश लोगों का यह मानना है कि यह ग्रंथ बड़ा ही जटिल और दुरुह है और इसके ज्ञान को समझ पाना बड़ा ही कठिन। वहीं पर एक sizeable minority का ऐसा opinion है कि यह ग्रंथ जीवन जीने का manual है और यह उतना ही सरल है जितना कि जीवन को जीना। और गीता-ज्ञान की all-inclusivity दोनो thought process को justify करने के लिए enough evidences provide कर देती है।

"एक ही मधुर गाना है" - संगीत से अनजान या अल्प ज्ञान रखने वालों के लिए समझ पाना बड़ा ही कठिन- वह राग-सुर-ताल कैसे पहचाने? वह ग्रंथ पर ग्रंथ, टीकाओं पर टीका पलटे जा रहा है, संगीत का व्याकरण पढ़े जा रहा है, स्वर-लहरी और गीत-माधुर्य के सिद्धांत को रटे जा रहा है। वह अच्छे गाने वाले को गाते देखता जा रहा है, उनका गीत सुनता जा रहा है। और इतना सब कुछ करने के बाद अगर फिर भी वह अच्छा गाना नहीं गा पाता, तो उसकी हताश प्रतिक्रिया यही होती है कि गाना गाना, संगीत सीखना बड़ा ही जटिल, दुरुह और कठिन है! अगर वह अच्छा गाना गाता भी है तो, गाने में डूबने की जगह, उसके भावों को पकड़ने की जगह उसका ध्यान केवल सुर, ताल और लय के विन्यास पर ही रहता है। दुनिया में अधिकतर लोग इसी तरह से संगीत सीखने की कोशिश करते हैं।

वहीं पर कुछ लोगों का बड़ा ही different approach रहता है। वह संगीत सीखने को एक स्वाभाविक प्रक्रिया मानते हैं। उनका यह मानना है कि संगीत जीवन का सम-गीत है और सांस लेने जैसा ही natural है। अर्थात उसकी सिद्धांत और व्याकरण सांसो की लय से प्रभावित, निर्मित एवं निष्पादित होते हैं। वे एक अच्छे music teacher के पास जाकर रागों का रियाज़ और सुरों का अभ्यास करने लगते हैं। वे रागों के नाम और उनके उदाहरणों को रटने की जगह पर उसे आत्मसात करने की कोशिश करते हैं। वे संगीत की परीक्षा की तैयारी नहीं करते, वरन संगीत को जीने लगते हैं।

श्रीमद्भागवत गीता से संबद्ध दोनों different opinions के बीच का अंतर बस इतना ही सरल है। गीता पढ़ने कि नहीं, जीने की चीज है। यह तो भगवान का वह गीत है जो विश्व के कण-कण में और हमारे जीवन के क्षण-क्षण में विद्यमान है। एक किताब के रूप में जब इसे पढ़ेंगे, तो यह सही में बड़ा ही जटिल है। इसके अनुसार जिएंगे तो इसका ज्ञान खुद-ब-खुद जीवन में उतर जाएगा। गीता के दर्शन की व्याख्या निम्नलिखित पंक्तियों से बेहतर कुछ और नहीं हो सकता।

''I slept and dreamt that Life was Joy,
I woke and found that Life was Duty,
I acted
And behold!
Duty was Joy''.

(Rabindranath Tagore)


Shrawan Singh

Shrawan Singh

An engineer(IITian) by qualification, educationist by profession and mythologist by passion. He fathoms up to the deeper roots of mythological stories and wisdom enshrined in our Sanatana dharma texts like Vedas, Puranas, Epics and specially Gita. He is a naturally gifted speaker and enthrall the audience with the waves of his rhythmic intonation and way of story-telling.

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