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गीता दर्शन- 26


गीता के मौन प्रश्न- 2
Indian psyche का pattern बड़ा ही अद्भुत है। सनातन धर्म के दो प्रमुख वाहकों - 'रामायण' और 'महाभारत' को वह बिल्कुल ही differently treat करता है। वह रामायण को बड़े elated होकर उदात्त मन से स्वीकार करता है, उसकी चर्चा में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेता है, उसके उदाहरणों और प्रसंगों को वह बार-बार दुहराया करता है। उसके कथा विन्यास और चरित्रों की व्यूह रचना में वह संस्कृति के popular virtues को ढूंढता है। संबंध निभाने के role models के उदाहरण अक्सर इस कथानक से लिए जाते हैं और और हम सचमुच में यह चाहते हैं कि हमारे परिवार में, हमारे समाज में इसमें वर्णित चरित्रों की बहुलता हो; वैसे ही लोग हमारे जीवन से जुड़े रहे।

महाभारत का विषय क्षेत्र और कथानक कहीं ज्यादा ही व्यापक है। स्वयं वेदव्यास की भी इस ग्रंथ के प्रति की गई उद्घोषणा है - 
" धर्मे च अर्थे च कामे च मोक्षे च भरतवर्षभ,
यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत्कवचित् ।"
विश्व में जो कुछ भी विद्यमान है, उसकी व्याख्या और प्रसंग इस ग्रंथ में उद्धृत है और जो कुछ भी इस ग्रंथ में नहीं है, विश्व में कहीं भी नहीं पाया जा सकता। फिर भी popular psyche में महाभारत के कथानक और उसके चरित्रों को लेकर व्यापक स्वीकार्यता नहीं है और हमारी अंतःचेतना समाज के आदर्श प्रतिमानों (role models) के लिए उन्हें उदात्त भाव से स्वीकार नहीं करती। हम सहजता से उन चरित्रों का उदाहरण नहीं देते और ना ही यह चाहते हैं कि हमारे इर्द-गिर्द उस चरित्र के लोग रहें।

श्रीमद्भागवत गीता इसी विशाल ब्रह्मांड को प्रदर्शित करते हुए महाभारत का एक अंग है। इस दर्शनशास्त्र और कर्मशास्त्र की पृष्ठभूमि भी एक ही परिवार में  property के  लिए हो रहे भाइयों के बीच हो रहे झगड़े-  'महाभारत का युद्ध' है। यहां तक कि, ज्ञान देने के लिए भी classroom का setup युद्ध स्थल पर ही लगाया गया है! शिष्य भाईयों और परिवार वालों से युद्ध नहीं करना चाहता और गुरु विभिन्न रूपों में ज्ञान देकर उसे भयंकर युद्ध की ओर प्रवृत्त कर रहा है। हमारी black and white pattern में designed मानसिकता को इतनी सारी विसंगतियां ( inconsistencies) रास नहीं आती। ना वह उसे समझना चाहता है और ना ही किसी और को समझाना; शायद थोड़ा मुश्किल काम भी है। 

और शायद इसलिए जाने-अनजाने में हमारे अवचेतन मस्तिष्क( sub- conscious mind) ने 'महाभारत' और उसमे वर्णित 'गीता' को वर्जनाओं के क्षेत्र (Taboo zone) में धकेल दिया है। हम अपने बच्चों से इनकी कहानियां थोड़ी सी सहम-सहम कर सुनाते हैं या सही मायनों में सुनाने से बचते हैं। mental conditioning की यह परंपरा इतने गहराई में established हो गई है, कि हम खुद गीता नहीं पढ़ना चाहते हैं, न ही पढ़ाना चाहते हैं।

Shrawan Singh

Shrawan Singh

An engineer(IITian) by qualification, educationist by profession and mythologist by passion. He fathoms up to the deeper roots of mythological stories and wisdom enshrined in our Sanatana dharma texts like Vedas, Puranas, Epics and specially Gita. He is a naturally gifted speaker and enthrall the audience with the waves of his rhythmic intonation and way of story-telling.

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