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गीता दर्शन-25


गीता के मौन प्रश्न -1
भारत भूमि की धर्म-चेतना इतनी प्रखर और प्रबल है कि जनमानस में श्रीमद्भागवत गीता के बारे में बहुत सारे well-established और well-known perceptions विद्यमान हैं :
"इस ग्रंथ का ज्ञान सार्वभौमिक (universal) है। इसे देश,धर्म ,जाति या लिंग की सीमाओं से नहीं बाँधा जा सकता।"
"सनातन धर्म के प्रमुख प्रतिनिधि ग्रंथ होने के कारण eternity 
गीता-ज्ञान की प्रमुख विशेषता है और इसका ज्ञान आज भी उतना ही प्रासंगिक है।"
"बुद्धि विवेक के प्रयोग से जिस प्रश्न का उत्तर नहीं मिल पाता, जीवन के जिन व्यवहारिक उलझनों को हम सुलझा नहीं पाते, गीता के किसी श्लोक में उसका एक सहज सा उत्तर छिपा रहता है।"
"गीता पढ़ने से हम आध्यात्मिक और व्यावहारिक दोनों जीवन में सफल होने का तरीका मिलता है।"
"गीता का ज्ञान हमें मानसिक रूप से सबल बनाता है और हमारे व्यक्तित्व को उसके potential तक ले जाने में मदद करता है।"
" जीवन से जुड़े प्रत्येक क्षेत्र में गीता के wisdom और techniques का उपयोग किया जा सकता है।"

इस list की कोई सीमा भी नहीं है। महत्वपूर्ण बात यह है कि ऐसे सारे perceptions मनगढ़ंत बातें नहीं, अपितु सारे के सारे 100% सत्य (facts) हैं और सारे लोग यह जानते भी हैं। और इस पूरे संदर्भ का सबसे आश्चर्यजनक पहलू यह है कि इतना सब कुछ जानते हुए भी लोग गीता नहीं पढ़ते या नहीं पढ़ना चाहते। applied knowledge पर based जीवन जीने इस manual की लोकप्रियता में तो कोई संदेह नहीं, पर इसे पढ़ने समझने की उत्सुकता और जिज्ञासा बहुत कम लोगों में पाई जाती है।

इसका एक महत्वपूर्ण कारण है हमारे जीवन जीने की शैली और विचारधारा में एक विकृत परिवर्तन। सनातन धर्म, जो वस्तुतः जीवन जीने का आधार के रूप में विकसित किया गया था, उसे  हमने जीवन का एक optional हिस्से में बदल दिया है। हम पूरे जीवन को धर्मानुसार नहीं चलाना चाहते, बल्कि अपनी सुविधानुसार दिनभर में कुछ क्षण उसके लिए निकालते हैं या उसमें भी कोताही करते हैं। धर्म को उसके वास्तविक स्वरूप से पूजा-पाठ मैं परिवर्तित कर देने का यह fallout है।

उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण कारण है श्रीमद्भागवत गीता को लेकर एक perceptual blunder-  हमने इसे एक धार्मिक ग्रंथ में बदल दिया है। हम इसे पढ़ने की जगह इसकी पूजा करने लगे हैं। हम उसकी शिक्षाओं को जीवन में apply नहीं करते। हम गीता को जरूर मानते हैं, मगर गीता की नहीं मानते!
Shrawan Singh

Shrawan Singh

An engineer(IITian) by qualification, educationist by profession and mythologist by passion. He fathoms up to the deeper roots of mythological stories and wisdom enshrined in our Sanatana dharma texts like Vedas, Puranas, Epics and specially Gita. He is a naturally gifted speaker and enthrall the audience with the waves of his rhythmic intonation and way of story-telling.

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