Flash Stories
recent

गीता दर्शन-24


गीता में अध्यात्म-2
सनातन धर्म के दर्शन में "अध्यात्म" शब्द का उपयोग बहुत ही व्यापक रूप में किया जाता है। यह रास्ता भी है, उस राह पर चलने की प्रक्रिया भी है, और मंजिल भी वही है। व्यक्ति के मूल स्वभाव को प्राप्त करने के रास्ते को भी अध्यात्म कहते हैं, अपने innate nature को जानने की प्रक्रिया भी अध्यात्म कहलाती है और उस भाव-प्राप्ति की अंतिम अवस्था को भी अध्यात्म की ही संज्ञा देते हैं। सरल शब्दों में इसका प्रयोजन वस्तु का संबंध उसके मूल तत्व (उपादान कारक) से करवाना है, व्यक्तित्व को उसकी प्रबुद्ध चेतना की ओर ले जाना है। ऐसा हर प्रयत्न personality को उसके 'स्व' की और ले जाता है। 

प्रत्येक ‘स्व’ एक अलग इकाई है। इसकी अपनी देह है, अपना मन है, बुध्दि है, विवेक है, दृष्टि है, विचार हैं। इन सबसे मिलकर अपने भीतर एक नया जगत् बनता है। इस भीतरी जगत् की अपनी निजी अनुभूति है, प्रीति और रीति भी है। अपने प्रियजन हैं, अपने इष्ट हैं। इस जगत के अपने राग विराग हैं। इन सबसे मिलकर बनता है ”एक भाव” - इसे ‘स्वभाव’ कहते हैं। स्वभाव नितांत निजी वैयक्तिक अनुभूति होता है लेकिन स्वभाव की निर्मिति में माँ, पिता, मित्र परिजन और सम्पूर्ण समाज का प्रभाव पड़ता है। इस जगत की भाविक और भौगोलिक सीमाएं बनते बिगड़ते रहते हैं, लेकिन संविधान में परिवर्तन नहीं होता। 

अध्यात्म इसी स्वभाव का विश्लेषण एवं अन्वेषण है, वह आत्म का अध्ययन है। हम क्या हैं, हमारा विचार जगत क्या है, हमारा स्वधर्म क्या है- यह हमें अवश्य पता होना चाहिए। क्योंकि यही मूल भाव हमारे कर्म निर्धारित करेंगे। श्रीमद्भागवत गीता व्यक्ति के 'स्वभाव' और उसके 'निमित्त कर्म' को एक दूसरे से स्वतंत्र नहीं मानती, वरन् वह उनके मध्य व पूरक संबंध स्थापित करती हैं। व्यक्ति जैसा है, वैसा ही बहुत कर्म करेगा अथवा व्यक्ति जैसा कर्म करेगा,वैसा ही उसका स्वभाव हो जाएगा। अपने स्वभाव की प्रतीति करनी हो, तो अपने कर्मों का विश्लेषण कर लें अथवा अपने लिए निमित्त कर्म निर्धारित करना हो, तो अपने स्वभाव की व्याख्या कर लें। 

Shrawan Singh

Shrawan Singh

An engineer(IITian) by qualification, educationist by profession and mythologist by passion. He fathoms up to the deeper roots of mythological stories and wisdom enshrined in our Sanatana dharma texts like Vedas, Puranas, Epics and specially Gita. He is a naturally gifted speaker and enthrall the audience with the waves of his rhythmic intonation and way of story-telling.

No comments:

Post a Comment

Powered by Blogger.