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गीता दर्शन- 23


गीता में अध्यात्म- 1
अध्यात्म का प्रचलित अर्थ है - ईश्वर, धर्म, दर्शन, मोक्ष आदि आदर्शों के प्रति जीवन और विचारों को समर्पित कर देना। और इस प्रचलित मान्यता के आधार पर आध्यात्मिक होने का अर्थ है- जो ईश्वर के बारे में चिंतन करता है, जो धार्मिक कार्यों में लिप्त रहता है, जो दर्शन शास्त्र का अध्ययन और उसमे वर्णित जटिल शब्दों की व्याख्या करता है, जो मोक्ष के प्रति सजग रहता है। विद्वान लोग आध्यात्मिक और धार्मिक व्यक्ति में भी अंतर स्पष्ट करते हैं। वहीं पर कुछ इन्हें एक-दूसरे का sub-set भी बताते हैं। और इस परिभाषा से अमूमन हमें अपने समाज में चार तरह के व्यक्ति मिलते हैं - जो धार्मिक और आध्यात्मिक दोनों है, जो धार्मिक तो है पर आध्यात्मिक नहीं, जो आध्यात्मिक है लेकिन धार्मिक नहीं और वह जो धर्म-अध्यात्म सब कुछ भूल कर दुनियावी नियमों से सुखपूर्वक अपना जीवन गुजार रहा है। थोड़ी और गहराई में जाएं तो अध्यात्म का अर्थ है उस परम सत्ता ब्रह्म के बारे में चिंतन करते रहना, उसके स्वरूप को जानना और उसकी प्राप्ति के लिए कोशिश करते रहना। लेकिन धार्मिक क्रियाकलापों के between the lines को पढें और उसके तत्व को समझें, तो वह भी इसी दिशा में इंगित करता है। 

घिसी पिटी व्याख्याएं इसी तरह से confusion create करती हैं और आम लोगों को अध्यात्म के मर्म से दूर करते जाती है। श्रीमद्भागवत गीता का अध्यात्म इसके conventional treatment से बिल्कुल ही अलग है। इस अवधारणा को भी प्रस्तुत इसी तरह से किया गया है, जिससे हर पढ़ने वाला समझ जाए कि अध्यात्म का विषय बिल्कुल ही ब्रह्म और ईश्वर की चिंतन से अलग है। अध्याय 8 ,श्लोक 1 में अर्जुन श्रीकृष्ण से प्रश्न करते हैं- " किं तद्ब्रह्म, किमध्यात्मं (what is Brahman, what is adhyātma)। अध्यात्म ईश्वर या ब्रह्म चर्चा से अलग है, इसीलिए उसके लिए प्रश्न भी अलग है। और इसी विचारधारा को और स्पष्ट करते हुए श्री कृष्ण का उत्तर भी दोनों प्रश्न के लिए अलग-अलग है- "अक्षरं ब्रह्म परमं, स्वभावों अध्यात्म उच्यते" (The Supreme Indestructible Entity is called Brahman; one’s own self is called adhyātama) अर्थात परम अक्षर (कभी भी नष्ट न होने वाला) तत्व ब्रह्म है और प्रत्येक वस्तु का अपना मूलभाव (स्वभाव) अध्यात्म है। ब्रह्म या ईश्वर के बारे मे जानने की इच्छा इस जगत के परे देखने की प्रक्रिया है। वहीं अध्यात्म का ज्ञान की पिपासा संसार में रहने का प्रथम सोपान है। स्वयं की विवेचना, अपने अंतस् का अन्वेषण, अपने आप का अध्ययन, अपने राग-द्वैष, काम-क्रोध, राग-विराग की पूर्ण जानकारी इस अध्यात्म के अभिन्न अंग हैं।


Shrawan Singh

Shrawan Singh

An engineer(IITian) by qualification, educationist by profession and mythologist by passion. He fathoms up to the deeper roots of mythological stories and wisdom enshrined in our Sanatana dharma texts like Vedas, Puranas, Epics and specially Gita. He is a naturally gifted speaker and enthrall the audience with the waves of his rhythmic intonation and way of story-telling.

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