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गीता दर्शन - 15



श्रीमद भगवत गीता जी का सबसे ज्यादा घिसने -पिटने वाला श्लोक शायद "कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन " ही है । ज्यादातर समय लोग इसे आधा ही पढ़ते- लिखते हैं। अर्थ भी उसका सबों को अपने -अपने चश्मे के पावर के अनुसार ही दिखता है। भौतिकी का नियम है कि एक छोटा सा दर्पण पूरी चित्र बना सकता है, किंतु दिखेगा कितना यह फील्ड ऑफ व्यू अर्थात दृष्टि क्षेत्र पर निर्भर करता है। फल की चिंता किए बिना कर्म करते चाहिए । इस आधे श्लोक से प्रायः यही मतलब निकाला जाता है। ध्येय से ध्यान हटाकर सिर्फ कर्म करते रहना प्रासंगिक तो नहीं लगता। फल को ध्यान में रखकर यज्ञ के लिए संकल्पित तो होना ही पड़ेगा। निरर्थक यज्ञ करने का तो मतलब यूं ही वक्त को व्यर्थ करना ही होगा। किसी खास ईष्ट को ध्यान में रखकर ,संकल्पित होकर, कर्म रूपी यज्ञ में जुटिये और फिर अपने कर्म पर अडिग रहकर यज्ञ करते रहिए। यज्ञ आरम्भ करने के बाद, उसके परिणाम पर चिंता नहीं करना चाहिए। गुरु द्रोणाचार्य ने युद्धिष्थर को यही समझाया था कि एक बार जब युद्ध आरंभ हो जाए, तो यह नहीं सोचना कि मैं तुम्हारा गुरु हूँ। तब चिन्तन से कोई लाभ नहीं होगा क्योंकि अपना इष्ट प्राप्त करने के लिए यज्ञ आरंभ दोनों पक्ष कर चुके होंगे। जिसका कार्य को आपने आरंभ किया है उसका अंत यदि नहीं किया तो वह कार्य आप का अंत कर देगा। युद्ध टालने की अथक असंभव प्रयास के बाद जब युद्ध अवश्यंभावी हो ही गया, तब सभी वीर योद्धा स्वधर्म और स्वविवेक के अनुसार युद्ध में कूद गए। जैसे-जैसे युद्ध आगे बढता गया, युद्ध का परिणाम स्पष्ट दिखने भी लगा, किंतु तब भी वीर अपने यज्ञ में लगे रहे और जब तक परिणाम सामने नहीं आ गया सब अपने कर्म करते रहें । यह है निष्काम कर्म योग। निष्काम कर्म योग का यह मतलब कतई नहीं कि हम अपने उद्देश्य को ही भूल जाएं । आप किसी भी कर्म क्षेत्र में हो ,कर्म करने से पूर्व परिणाम के विषय में तर्क-वितर्क जरूर कर लें,  तदुपरांत जब कर्म योग आरंभ कर दें,    फिर तो कार्य का परिणाम ही बताएगा कि कार्य का आरंभ शुभ था या अशुभ ।

श्री कृष्ण जैसे सर्वज्ञ बिना किसी उद्देश्य दूत बनकर हस्तिनापुर नहीं गए थे । इंद्रदेव बिना किसी कारण ही कवच -कुंडल लेने कर्ण के पास नहीं गए थे। निरर्थक तो अवतार भी नहीं होते हैं ।

"यद यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।

धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥"
निर्थक कर्म कैसे किया जा सकता है। आचार- विचार के सतत साधना में लीन रहना ही निष्काम कर्म योग है। अत: परिणाम और उसके दूरगामी प्रभावों को सोच समझकर तर्क -वितर्क करके ही कर्म यज्ञ में आहुति डालिए और तब तक डालिए जब तक कि परिणाम आ ना जाए।
Sanjeev Jha

Sanjeev Jha

He is a writer and philosopher by nature.He had engrossed himself in writing for magazines like OUTLOOK and Vedant Keshari in his college days itself. Greatly Influenced by the learning shri Geeta Ji after completing engineering, he joined software industry, but a writer in his inner soul drived him in the noble profession of teaching and mentoring through the inner philosophy.

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