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गीता दर्शन -20


गीता में विरोधाभास- 2

सनातन धर्म की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि उसके सबसे प्रमुख आध्यात्मिक ग्रंथ की पृष्ठभूमि एक ही परिवार मे जायदाद/सत्ता के लिए भाईयों के बीच छिड़ा युद्ध है। पारिवारिक करूणा से वशीभूत होकर और रिश्ते-नातों के लिए सजग होकर अर्जुन युद्ध नहीं करना चाहता; वह राजपाट त्याग कर सन्यासी तक बनना चाहता है। और तभी picture में आता है गीता-ज्ञान, जो उसे उसके परिवार वालों से युद्ध करने की ओर प्रवृत्त करता है। सन्यास की ओर बढ़ रहे कदमों को युद्ध के क्षेत्र में मारकाट मचाने को लौटाने वाला अध्यात्म - है ना बिलकुल ही अद्भुत, विस्मयकारी, आश्चर्यजनक, विलक्षण विज्ञान!

सबसे पहले अर्जुन को ज्ञान मिला कि तू तो सब कुछ भूलाकर अपना कर्म कर। वह भी पूरा मन लगाकर, अपना 100%  देकर, पर फल तेरे हाथ में नहीं है; वह कोई और decide करेगा। फिर अगला संदेश आया कि कर्म का फल तू मेरे चरणों में अर्पित कर दे। बात यहीं तक नहीं रुकी; फिर बताया गया कि तू पूरे कर्म को ही मुझे अर्पित कर दे।

पहले ज्ञान मिला कि स्वधर्म पहचान,अपना कर्म पहचान और उसमें पूरे मनोयोग से जुट जा, क्योंकि कर्म करना सबसे श्रेष्ठ है। पुनश्च "कर्म" से श्रेष्ठ "ज्ञान" को बताया गया और ज्ञानी को भगवान का सबसे प्रिय पात्र बताया गया। अंततः सबसे गुह्यतम ज्ञान मिला की "भक्ति" इन सबसे बेहतर और सर्वश्रेष्ठ फल देने वाली है।

अध्याय चार में भगवान "धर्म" को ग्लानि/ हानि से बचाने के लिए अवतार लेने की आवश्यकता प्रकट करते हैं, वही अध्याय अठारह आते-आते वो सभी प्रचलित "धर्मों" को छोड़कर खुद उनकी शरण में आने को प्रेरित करते हैं। और ऐसा करने से वह सभी पूर्व पापों से मुक्त और शुद्ध करने का वचन भी देते हैं!

पहले प्रभु बोलते हैं कि इस पूरे विश्व में उनका कोई प्रिय नहीं है; सभी को वो value-neutral होकर एक ही नजर से देखते हैं। परंतु कथावस्तु के विस्तार में जगह-जगह पर वह ऐसे बहुत सारे गुणों (qualifications) की list गिनाने लगते हैं, जो उनका प्रिय है और उनके बहुत करीब है। यहां तक कि अर्जुन को भी यह कहा कि वह उनका मित्र है और उनका प्रिय है, इसलिए यह गुप्त ज्ञान उसे दे रहे हैं!

श्रीमद्भागवत गीता में ऐसे सतही विरोधाभास (apparent paradoxes and contradictions) और भी कई सारे हैं, लेकिन उनको संकलित और समायोजित करना अपना ध्येय नहीं है। मुख्य उद्देश्य यह है कि हम इन विसंगतियों की व्याख्या, अन्वेषण और विश्लेषण holistic perspective में करें। हम-आप तो श्रीमद्भागवत गीता के दो चार श्लोक पढ़ते हैं और उससे अपने मतलब का ज्ञान लेकर जीवन क्षेत्र में बाहर निकल जाते हैं। बेचारे अर्जुन की व्यथा बहुत बड़ी है; उसे अंतिम क्षण से पहले पूरे परिपेक्ष्य से opt out होने का option नहीं है। उस बेचारे को हर वैसी चीज सुननी है, जो भविष्य में मानव जाति के लिए कल्याणकारी और जीवनोपयोगी सिद्ध हो। और गुरु की समस्या और विकट है- सामने तो है अर्जुन, सामने हैं अर्जुन की युद्ध से पलायन की समस्या, लेकिन उसे address करना है पूरी मानव जाति और उसकी सारी समस्याओं को।



Shrawan Singh

Shrawan Singh

An engineer(IITian) by qualification, educationist by profession and mythologist by passion. He fathoms up to the deeper roots of mythological stories and wisdom enshrined in our Sanatana dharma texts like Vedas, Puranas, Epics and specially Gita. He is a naturally gifted speaker and enthrall the audience with the waves of his rhythmic intonation and way of story-telling.

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