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गीता दर्शन -19


 गीता मे विरोधाभास-1

एक तटस्थ पाठक द्वारा श्रीमद्भागवत गीता के प्रथम से अंतिम श्लोक तक के अध्ययन के बाद कुछ निष्कर्ष जेहन में आते हैं और वह अमूमन हर पढ़ने वाले के मन को confused करती हैं। पूरी कथावस्तु के विस्तार में ही ग्रंथ को कम से कम दो भागों में बाँट देने की इच्छा होती है- गृहस्थों(प्रवृत्ति मार्ग वाले) के लिए गीता और दार्शनिकों(निवृत्ति मार्ग वाले) के लिए गीता। कुरुक्षेत्र के युद्ध स्थल पर आरंभ किया कथानक कभी yoga classes के postures की बात करता है, तो कभी पूजा करने की विधियों के बारे में विचार करता है। कभी वह भगवान के वैभवशाली वर्णन में जुट जाता है, तो कभी सतही स्तर पर उतर कर समाज के लोकाचारों को गिनाने लगता है। सही मायनों में एक निश्चित बुद्धि( definite direction) देने की जगह पर यह cafeteria approach में compiled विभिन्न विकल्प प्रदान करने का माध्यम लगने लगता है। अर्जुन को दिए हुए उपदेश कभी-कभी विरोधाभासी (contradictory) प्रतीत होते हैं - अर्थात एक intellectually confused और emotionally devastated mind को और  ज्यादा भ्रम की स्थिति में ले जाने की प्रक्रिया आरम्भ हो जाती है। लगने लगता है कि student की problem solve करने या उसके doubt clear करने की जगह teacher अपने ज्ञान का प्रदर्शन कर रहा है!

उपर्युक्त observations इतने obvious से हैं, जो हर गीता पढ़ने वाले के मन में एकबारगी(spontaneously) आ जाते हैं। और मजे की बात यह है कि गीता खुद इन भिन्न प्रतीत होने वाले वर्णित विचारधाराओं के मध्य कभी धागे पिरोने का काम नहीं करती; उन में सामंजस्य स्थापित करने की कोशिश नहीं करती। In fact, उसे तो इसकी जरूरत भी नहीं महसूस होती! शायद उसे/ उपदेशक को इनमें अंतर स्पष्ट नहीं होगा, उनके बीच की सीमा रेखा भी नहीं दिखती होगी!

गीता पढ़ने वाले तो confusion की स्थिति में ग्रंथ को पढ़ना बीच में ही छोड़ सकते हैं, पर उसे जीने वालों/ उसके पात्र के पास यह option नहीं होता। सम्मोहित और संशय से भरे अर्जुन को तो पूरी गीता सुननी थी और उसी में से उसे अपने जीवन के लिए निर्देश निकालने थे। इसीलिए वह डटा रहा और अपना confusion बढ़ने की स्थिति में प्रश्न पूछता रहा; बीच मे  honestly उसने अपनी स्थिति भी स्पष्ट की-
"व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे |
तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम् ||" (3:2)
(My intellect is bewildered by your ambiguous advice. Please tell me decisively the one path by which I may attain the highest good.)




Shrawan Singh

Shrawan Singh

An engineer(IITian) by qualification, educationist by profession and mythologist by passion. He fathoms up to the deeper roots of mythological stories and wisdom enshrined in our Sanatana dharma texts like Vedas, Puranas, Epics and specially Gita. He is a naturally gifted speaker and enthrall the audience with the waves of his rhythmic intonation and way of story-telling.

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