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गीता दर्शन -17


हर मनुष्य का तीन concentric spherical ब्रह्मांड पृथक -पृथक है और यह किसी दूसरे मनुष्य के ब्रम्हांड रुपी sphere को प्रतिच्छेद नहीं करता है । प्रभाव field lines के डिस्टॉर्शन में होता जरूर है, किंतु यह field lines एक दूसरे को कभी काटते नहीं है । क्योंकि यह फील्ड लाइन सामान्यता दृष्टिगोचर नहीं होते, अतः बहुतायत ऐसी मरीचिका प्रतीत होने लगता है कि हम किसी के spherical ब्रह्मांड को अथवा field lines को बदल सकते हैं । श्रीमद भगवत गीता में श्रीकृष्ण बारंबार यह समझाना चाह रहे हैं कि जीवात्मा सिर्फ कर्म कर सकता है अपना field line align कर सकता है किसी दूसरे के field line को नहीं बदल सकता या उसे प्रति छेद नहीं कर सकता। किसी का प्रारब्ध कोई नहीं बदलता, स्वयं श्रीकृष्ण भी नहीं। 
"न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्‌ ।
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः। "
 जीवात्मा को निरंतर अपने प्रकृति के अनुरूप निरंतर कर्म विवश होकर करना पड़ता है ,जो उसके फील्ड लाइंस को  continuous curve बनाता है वह किस shape में होगा यह भी व्यक्ति विशेष पर ही केंद्रित होता है । भीष्म अपने  field line line से हस्तिनापुर के field lines को काटने का प्रयास  अन्तिम समय तक करते रहे। आजीवन ब्रह्मचारी रहने से लेकर अंबा -अंबालिका- अंबिका के अपहरण व दुर्योधन के पक्ष में युद्ध करने तक वह दुर्योधन और हस्तिनापुर के field lines में इंटरफेयर करने की कोशिश करते रहे ।दुर्योधन को भी अपने field से ज्यादा अपने योद्धाओं के field पर भरोसा करता था । इच्छा मृत्यु की वरदान प्राप्त भीष्म, हाथ में शस्त्र होते हुए अपराजेय गुरु द्रोणाचार्य, अमरत्व को प्राप्त अश्वत्थामा, कवच कुंडल के साथ जन्म लेने वाले कर्ण और महाशक्तिशाली शल्य जैसे युद्ध पतियों से सुसज्जित कौरव सेना भी ताश के पत्ते की तरह बिखर गई। इन सब की व्यक्तिगत फील्ड लाइंस ने इन्हें इतिहास में अमर कर दिया। अपने व्यक्तिगत ब्रह्मांड में तो ये ध्रुव तारा बन ही गए अपने कर्म फलों के आधार पर। किंतु यह सब मिलकर भी दुर्योधन के ब्रह्मांड को प्रकाशित नहीं कर सकते थे। पांच पांडव मिलकर महाभारत विजय कर लिए, किंतु स्वर्गारोहण में सबके अपने अपने कर्म फल के अनुसार ही गति मिली। 
आज के समय में भी यह प्रासंगिक है। कोई व्यक्ति यदि विद्वान है तो यह कतई आवश्यक नहीं कि उसका पुत्र या पुत्री भी विद्वान होगा। पिता के आकार से पुत्र का आकार तय नहीं होता। दोनों के field lines पृथक पृथक है। व्यक्ति किसी को प्रेरित कर सकता है किन्तु उसके कर्म को नहीं बदल सकता। एक पिता अपने पुत्र का, एक गुरु अपने शिष्य का अथवा प्रभु अपने भक्तों का फील्ड लाइन को  प्रतिच्छेद नहीं कर सकते। हां अपने ब्रह्मांड से सकारात्मक ऊर्जा का रेडिएशन करते रहिए कहीं ना कहीं तो वह ऊर्जा संरक्षित होती ही है। 

Sanjeev Jha

Sanjeev Jha

He is a writer and philosopher by nature.He had engrossed himself in writing for magazines like OUTLOOK and Vedant Keshari in his college days itself. Greatly Influenced by the learning shri Geeta Ji after completing engineering, he joined software industry, but a writer in his inner soul drived him in the noble profession of teaching and mentoring through the inner philosophy.

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