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गीता दर्शन -14





एक मनुष्य के ब्रह्मांड को तीन Co-centric Spheres द्वारा निरूपित किया जा सकता है - व्यक्ति ,उसका समाज और आसपास का वातावरण। सबसे भीतर के sphere में कार्यरत मुख्यतया तीन driving forces/ executors हैं - शरीर (body), मन(mind) और वाणी(speech)। शरीर कर्ता बनकर, मन और इंद्रियों द्वारा अपने बाहर देखता-बूझता है और इस प्रक्रिया से आई समझ (perception) को वाणी द्वारा बाहर की दुनिया के लिए निस्सरित कर देता है। और इस lively dynamism के आधार पर व्यक्तित्व को परिमार्जित और परिशोधित करने के लिए योगेश्वर श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भागवतगीता में शरीर मन और वाणी के तप की चर्चा की है। 'तप' का अर्थ होता ताप देना /अग्नि मे रखना। स्वर्ण को अग्नि में डालने से सारी अशुद्धियाँ वाष्पीकृत होकर उड़ती चली जाती हैं और उसका शुद्धिकरण होता चला जाता है।

गीता का ज्ञान जीवन जीने का विज्ञान है। यह देह का निषेध नहीं करती, वरन उसे जीवन को सामान्य से दिव्य बनाने का साधन मानती है। इसीलिए गीता में 'शरीर का तप' को प्रचलित मान्यताओं (शरीर को कृषकाय करना) से बिल्कुल भिन्न सोचा गया है। यह तब बिल्कुल ही सरल है; कोई भी जीवन जीते जीते इसे आराम से कर सकता है। सामान्य सा पंचसूत्री कार्यक्रम है - बड़ों के प्रति कृतज्ञ रहना, व्यवहार में सरलता और सहजता लाना, विचारों से विकारों को हटाते रहना, उच्चतम लक्ष्य की ओर हमेशा प्रयासरत रहना और किसी का नुकसान ना करना।
"देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम् |
ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते ||" (17:14 )
(Worship of the Supreme Lord, the Brahmins, the spiritual master, the wise, and the elders done with the observance of cleanliness, simplicity, celibacy, and non-violence is declared as the austerity of the body.)

वाणी मनुष्य के व्यक्तित्व और उसके मनोस्थिति की बाहृय अभिव्यक्ति है। सामान्य जीवन में व्यक्ति का by and large perception उसके द्वारा उच्चारित कर रहे शब्दों और उसके आवेग से ही होती है। इसलिए गीता ने हितकारी और प्रियतम सम्भाषण को व्यक्तित्व का भूषण बताया है।
"अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत् |
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते ||" (17:15)
(Words that do not cause distress, are truthful, inoffensive, and beneficial, as well as the regular recitation of the Vedic scriptures—these are declared as the austerity of speech.)

शरीर और वाणी के तप से ज्यादा महत्वपूर्ण है - मन का तप। व्यक्तित्व विकास की प्रक्रिया का सबसे अभिन्न अंग है - मन पर नियंत्रण। मन तो बस एक उपवन के समान है जहां हम निर्धारित करते हैं कि किस तरह के फूल उगाए जाए।
"उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् |
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मन: ||" (6:5 )
( Elevate yourself through the power of your mind, and not degrade yourself, for the mind can be the friend and also the enemy of the self.)

मन की शक्ति को प्रबल करने के लिए योगेश्वर श्रीकृष्ण ने मानसिक तप का सहज संसाधन बताया है- प्रफुल्ल चित्त रहना, विचारों में सौम्यता रखना, मौन का अभ्यास करना, विचारों पर नियंत्रण रखना और अपने उद्देश्य में शुद्धता रखना।
"मन: प्रसाद: सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रह: |
भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते ||" (17:16)
(Serenity of thought, gentleness, silence, self-control, and purity of purpose—all these are declared as the austerity of the mind.)

तीनों प्रकार के तपों का एक दूसरे के साथ symbiotic realtionship है; ये एक दूसरे को strenghthen करते हैं। किसी भी एक का आचरण बाकी दोनों तरह के तपों का initiation point है। इसीलिए गीता का संदेश है कि इनमें से जो भी सहज और सुगम हो, उसे अपने जीवन और व्यवहार में समाहित कर लेना चाहिए।


Shrawan Singh

Shrawan Singh

An engineer(IITian) by qualification, educationist by profession and mythologist by passion. He fathoms up to the deeper roots of mythological stories and wisdom enshrined in our Sanatana dharma texts like Vedas, Puranas, Epics and specially Gita. He is a naturally gifted speaker and enthrall the audience with the waves of his rhythmic intonation and way of story-telling.

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