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गीता दर्शन - 12

                               स्वधर्म- 3
मानव मन में चल रहे विचार श्रृंखला की एक बड़ी ही विस्मयकारी विशेषता है कि, जो उसे सहजता से प्राप्त होता है और सुगमता से executable होता है, जो उसकी ज़िन्दगी से जुड़ा बिल्कुल अपना सा लगता है, वो उसके प्रति तटस्थ और उदासीन होता जाता है। उसे आकर्षित करते हैं - दूसरों की ज़िन्दगी, उनके विचार, उनके काम करने के तरीके, उनके achievements ! स्वधर्म नीरस सा लगता है, परधर्म सदैव आकर्षित करता है। नए रास्तों के, नए तरीकों के, नई तरह की जिंदगी का अंजानापन अपने आप में एक बड़ा आकर्षण होता है, पर ऐसी जिंदगी पूरी तरह से unnatural, imposed और incoherent होती है ; कभी-कभी illogical और irrational भी लगती है (मछली की हवा में उड़ने की इच्छा या पक्षियों की जल में तैरने की इच्छा)।

ऐसी ही कुछ इच्छा (अपने क्षत्रिय धर्म के कर्तव्य को त्याग कर सन्यास अंगीकार करने की) कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन ने भी योगेश्वर श्रीकृष्ण के समक्ष व्यक्त की। उसके समान पराक्रमी योद्धा अस्त्र-शस्त्र त्यागने की बात करने लगा। भिक्षा मांग कर अपने जीवन यापन करने की बात करने लगा। और यहां हर जी रहे अर्जुन की गाथा है; वह अपने स्वधर्म को छोड़कर परधर्म में जीने की आकांक्षा पालते रहता है। हम वर्ण धर्म का अतिक्रमण करना चाहते है, आश्रम धर्म की सीमाओं को लांघना चाहते हैं। वर्णाश्रम धर्म की prescribed duties हमें boring और monotonous लगने लगती है, मनुष्यता को परिभाषित करते कुछ सामान्य धर्म निभाना भी जटिल लगने लगता है।

और सबसे बड़ी विडंबना यह है कि मन इस धर्म परिवर्तन के लिए भी बहुत सारे justification पैदा कर लेता है! वह खुद को और दूसरों को ऐसे किसी भी कृत्य के लिए logically convinced करने की कोशिश करता रहता है। पर सबसे बड़ा सत्य यह है कि ऐसी कोई भी कोशिश एक विषाद की अवस्था को जन्म देती है और इसीलिए अपने समाज में जी रहे 'अर्जुन' अक्सर dejected और depressed feel कर रहे होते हैं। पर उससे भी बड़ी व्यथा यह है कि ऐसे हर अवसादग्रस्त अर्जुन को कृष्ण सरीखा गुरु नहीं मिल पाता, जो उसे शुद्ध सरल भाषा में उसका सही कर्म/धर्म समझा पाए-

"स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि |
धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते ||"(2:31)
( considering your duty as a warrior, you should not waver. Indeed, for a warrior, there is no better engagement than fighting for upholding of righteousness.)

परधर्म हमें चमकते सूरज के समान आकर्षित तो करता है, लेकिन हम सूरज की सतह पर जाकर नहीं रह सकते। वह समंदर की उदात्त लहरों की तरह हमें आमंत्रण तो देता है, लेकिन हम उसकी अतल गहराइयों में जी नहीं सकते। वह आसमान में उड़ने को तो बुलाता है, लेकिन हमें पंख नहीं देता, पैर टिकाने के लिए जमीन नहीं देता। वह excited और happening life की promise तो करता है , पर लाइफ की guarantee नहीं देता!

और कृष्ण हमें ऐसे lifeless life से बचाना चाहते हैं। वह किसी व्यक्तित्व के holistic development की बात करते हैं; उस path को वह बिल्कुल natural रखना चाहते हैं। उन्हें depression में जी रहा खोखला व्यक्ति नहीं चाहिए, वरन एक जीवंत व पूर्ण व्यक्तित्व चाहिए। इसीलिए कृष्ण हमें परधर्म के सम्मोहजनक आकर्षण से आगाह करते हैं और स्वधर्म को पहचान कर उसके अनुसार जीवन जीने की प्रेरणा देते हैं।





Shrawan Singh

Shrawan Singh

An engineer(IITian) by qualification, educationist by profession and mythologist by passion. He fathoms up to the deeper roots of mythological stories and wisdom enshrined in our Sanatana dharma texts like Vedas, Puranas, Epics and specially Gita. He is a naturally gifted speaker and enthrall the audience with the waves of his rhythmic intonation and way of story-telling.

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