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गीता दर्शन - 4


मन रूपी अश्व को साधना इतना सरल भी नहीं है, तभी तो अर्जुन जैसा वीर भी विचलित हो उठता है ।
"चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम्।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्।"
मन को वश में करना वायु को वश में करने के समान है । यक्ष प्रश्न के जवाब में युधिष्ठिर भी कहते हैं वायु की गति से भी तेज चलता है मन।
मन को वश में करने का सबसे पहला माध्यम है "एकाग्रता"।

एकलव्य को जब गुरु ने दीक्षा नहीं दी, तो वह अपने अंदर भडके अग्नि को एकाग्र करके ,ज्वालामुखी बनाया और बिना किसी प्रचार प्रसार के सच्ची निष्ठा और लगन से अपने ध्येय को प्राप्त करने में लग गया। परिणामस्वरूप सारे सुख सुविधा और साधन आसानी से उपलब्ध होते हुए भी अर्जुन की चमक उस एकाग्र चित्त और सच्चे कर्मयोगी एकलव्य के समक्ष फीकी पड़ रही थी। आज के युवा अर्जुन ,अभिमन्यु और अन्य रथियों को भी जरूरत है शोर -शराबा ,प्रदर्शन और आधुनिक मार्केटिंग से दूर संयमित और संकल्पित रहने की। कितना भी मार्केटिंग, ब्रांडिंग आगे पोजिशनिंग क्यों ना कर ले, प्रोडक्ट में दम नहीं रहेगा तो वह प्रतिद्वंद्विता में नहीं टिकेगा। गोधूलि वेला में सुदूर जंगल से पक्षियों की कलकलाहट की आती हुई आवाज हमेशा हर्षगाण ही नहीं कर रही होती। सूर्यास्त से पहले आसमान से अस्ताचलगामी सूर्य के ओझल होने को पूर्ण सूर्यास्त मानकर जयद्रथ की तरह जश्न मनाना भी मूर्खता ही है। इसलिए जब तक भी ध्येय प्राप्त ना हो जाए आधे अधूरे क्षणिक आंशिक सफलता में ही संतुष्ट होकर आत्ममुग्ध नहीं होना चाहिए। यदि एक बार भी आप का ध्यान भंग हुआ तो शांतनु की तरह देव लोक से भू लोक पर आ जाएंगे जिसे अर्श से फर्श पर पहुंचना भी कहते हैं।

श्रीमदभगवतगीता जी के अनुसार -
"असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् | 
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्येते।"............
अभ्यास और वैराग्य से मन वश में किया जा सकता है।

अर्जित किए गए ज्ञान का ,कौशल का समुचित अभ्यास यदि नहीं किया गया तो दीमक उसे बर्बाद कर ही देगा। यदि मशीन को नियमित प्रयोग नहीं किया जाए तो उसे जंग कबाड बना ही देता है। "करत- करत अभ्यास ते जड़मति होत सुजान।"अंबा की तरह, जब तक अपना मुकाम ना मिल जाए, प्रयास करते रहिए; बारंबार प्रयास करते रहिए और अपने लक्ष्य पर केंद्रित रहिये।

मन को वश में करने का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू है -"वैराग"। आज के समय में सबसे ज्यादा गलत समझे जाने वाले शब्दों में से एक है वैराग। वैराग का मतलब सन्यासी बन जाना नहीं है। महाराजा जनक गृहस्थ आश्रम में थे, फिर भी विदेह थे- वैरागी थे। वैराग का मतलब वैचारिक सात्विकता और वैराग्य से है। भीष्म ने अपनी प्रतिज्ञा की रक्षा के लिए; चुनौती बनकर  खड़े अपने गुरु परशुराम जी से गुरु वंदन के पश्चात, युद्ध की आज्ञा लेकर उनसे युद्ध किया और उनसे ही आशीर्वाद प्राप्त कर अपनी कीर्ति और बढ़ा ली। यह है वैराग। अपनी संकल्प के समक्ष खड़े सभी चुनौतियों लोकलुभावन वस्तुओं और मनोरथों से, खुद को संभालना है वैराग। घोड़े की तरह आंख पर पट्टी बांधकर ,अपने मार्ग पर केंद्रित होना है वैराग।

आप भी मानसिक और वैचारिक वैराग को अपनाईये और ज्ञान एवं शास्त्र का बारंबार अभ्यास करते हुए ,अपने लक्ष्य पर केंद्रित रहिए।आपकी विजय निश्चित है।
Sanjeev Jha

Sanjeev Jha

He is a writer and philosopher by nature.He had engrossed himself in writing for magazines like OUTLOOK and Vedant Keshari in his college days itself. Greatly Influenced by the learning shri Geeta Ji after completing engineering, he joined software industry, but a writer in his inner soul drived him in the noble profession of teaching and mentoring through the inner philosophy.

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