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गीता दर्शन - 16


श्रीमद्भागवत गीता का विज्ञान क्रमिक, उत्तरोत्तर और सतत परिवर्तन के सिद्धांत का उद्घोषक है और यह चेतना/बुद्धि के किसी भी स्तर पर अवस्थित व्यक्ति को अपील करता है। इसकी popularity और  universal acceptibility का भी यही कारण है। हर किसी को यह लगता है कि गीता ज्ञान उसके व्यक्तित्व(personality) और अंतस ( inner self) के विकास के लिए सहायक है। और इसका मुख्य कारण है गुरु श्रीकृष्ण के teaching style की modus-operandi, जो ज्ञान को conclusion नहीं, process के रूप में deliver करता  हैं। ज्ञान की इस सीढ़ी पर, जो भी जहाँ से चाहे अपनी upward journey आरंभ कर सकता है।

अपने अंतस के जड़ों को संपोषित करने के लिए योगेश्वर ने शरीर, वाणी और मन के 'तप' करने का रास्ता बताया और प्रत्येक के लिए समुचित  'पंचशील विधान' (five-folded method) भी समझाया। तत्पश्चात एक सच्चे गुरु की तरह उन्होंने execution level पर तीन मुख्य स्तरों पर इसकी विवेचना की। और वस्तुतः यह तीनों स्तर किसी भी कार्य के निष्पादन में आपको मिल जाएंगे! 

Execution के सबसे निम्न स्तर पर हमें ना तो उचित प्रयोजन (actual goal) ज्ञात होता है और ना ही उस क्रिया को करने का उचित विधान (proper method)। साधन- साध्य -प्रयोजन का उचित विश्लेषण किए बिना हठपूर्वक कार्य आरंभ करना इसी श्रेणी में आता है। Subconscious mind मे तो ऐसे कार्य का उद्देश्य दूसरे को तकलीफ देना/ नीचा दिखाना होता है, पर actually अंत में यह हमारे शरीर मन और वाणी को ही कष्ट देता है। गीता में इसे 'तामसिक तप' कहा गया है।
"मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तप:|
परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम् ||" ( 17: 19)
(Austerity that is performed by those with confused notions, and which involves torturing the self or harming others, is described to be in the mode of ignorance.)

गीता में कर्म की निष्फलता के सिद्धांत का पूर्ण रूप से खंडन किया गया है। अगर काम किया गया है, तो उसके फल का अस्तित्व अवश्य होगा। और उस फल की प्राप्ति के लिए उस कार्य को करने का एक उचित तरीका भी होगा। Execution के अगले स्तर पर कर्ता इन दोनों पहलुओं से युक्त होता है। उसे कार्य करने की विधि और उससे प्राप्त होने वाला फल दोनों ज्ञात होते हैं और accordingly वह अपने कार्य मे लीन भी रहता है। पर हर क्षण उसके मन में फल-प्राप्ति और उस से प्राप्त होने वाले सम्मान ,प्रशंसा ,आदर , सुख/दुख आदि की परिकल्पना छाई रहती है और इसीलिए वह अपने कार्य में 100% नहीं दे पाता। ऐसी अवस्था को 'राजसिक तप' की संज्ञा दी गई है।
"सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत् |
क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम् ||" (17:18 )
(Austerity that is performed with ostentation for the sake of gaining honor, respect, and adoration is in the mode of passion. Its benefits are unstable and transitory.)

फल तो अवश्यंभावी है ही, लेकिन उसका सदैव चिंतन करते रहना उसकी प्राप्ति में एक बहुत बड़ा बाधक है। गीता मे इन दोनो पहलूओं के मध्य सामंजस्य की उत्पत्ति की गई - हमारे प्रयत्नों में निष्फलता (aimless work) और सकामता ( fruit-driven action) दोनों का पूर्ण अभाव होना चाहिए। 100% conviction( पूर्ण श्रद्धा) के साथ   ऐसे  execution को  उच्चतम स्तर (सात्विक  तप) माना गया है।
"श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत्त्रिविधं नरै: |
अफलाकाङ्क्षिभिर्युक्तै: सात्विकं परिचक्षते||" (17:17)
(When devout persons with ardent faith practice these three-fold austerities without yearning for material rewards, they are designated as austerities in the mode of goodness.)

त्रिगुणों( सत , रज और तम) के संयोग द्वारा प्रदत्त और निर्मित अपनी प्रकृति हमें पहचाननी चाहिए और प्रारंभ चाहे जिस भी रूप में हो,  धीरे-धीरे उच्चतर सोपनों  की तरफ बढ़ते रहना चाहिए। इसी में हमारे जीवन की सार्थकता है।



Shrawan Singh

Shrawan Singh

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