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गीता दर्शन -11

                             
                               स्वधर्म -2
तीनों गुणों के mixing से मनुष्य का वर्ण निर्धारित हुआ, जिसने स्वभाव और अंत: चेतना को परिभाषित किया। इसी स्वभाव के आधार पर और उसके आश्रम (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास) की अवस्था के अनुरूप कुछ नियत कार्य/व्यवहार/नियम निर्धारित हुए, जो उसके innate nature को परिलक्षित और निर्मित करता है। उस मनुष्य का असली प्रतिबिंब,असली चित्र वही है और वह व्यक्तित्व जिस आधार पर खड़ा है, वही है स्वधर्म। स्वधर्म बिल्कुल प्राकृतिक है; वह उसका अपना है। उसका निर्वाह सुगमता से किया जा सकता है; उसे सहजता से निभाया जा सकता है।

योगेश्वर श्रीकृष्ण के perfect teaching system की एक बड़ी ही subtle सी खासियत है, जो हर एक शिक्षक को अपनी आदत में ले आना चाहिए। वह mandatory point है- important concepts को दोहराना और वो भी थोड़ा प्रारूप बदलकर। बात वही रहेगी, लेकिन थोड़ी नई भी लगेगी।
"श्रेयान्स्वधर्मो विगुण: परधर्मात्स्वनुष्ठितात् |
स्वधर्मे निधनं श्रेय: परधर्मो भयावह: ||" ( 3:35)
(It is far better to perform one’s natural prescribed duty, though tinged with faults, than to perform another’s prescribed duty, though perfectly. In fact, it is preferable to die in the discharge of one’s duty, than to follow the path of another, which is fraught with danger.)

श्रेयान्स्वधर्मो विगुण: परधर्मात्स्वनुष्ठितात् |
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् || (18:47)
(It is better to do one’s own dharma, even though imperfectly, than to do another’s dharma, even though perfectly. By doing one’s innate duties, a person does not incur sin.)

एक से लग रहे इन दोनों श्लोकों में श्री कृष्ण ने बिल्कुल ही crystal clear संदेश दिया कि व्यक्ति को अपने स्वधर्म का ही पालन करना चाहिए, परधर्म का नहीं। परधर्म भयावह है, क्योंकि वह इंसान को खुद (innate nature and inclinations) से लड़ने को मजबूर करता है। उसके अंदर एक महाभारत का युद्ध चलता रहेगा, जिसके दोनों तरफ वह खुद है। शस्त्र उठाएगा भी वह, तो खुद को ही मारने को। जीते चाहे कोई भी, पर क्षत-विक्षत तो उसे ही होना है!

स्वधर्म निभाना बिलकुल स्वाभाविक है; वैसा ही जैसा चिड़िया के लिए हवा में उड़ना या मछली के लिए जल में तैरना। यह तो जीवन जीने की बस कला है; कार्य के सांचे में बस अपने व्यक्तित्व को पिघला देना है। परधर्म की परिकल्पना ही बड़ी ही डरावनी है - चिड़िया को जल में तैरने को कहना है और मछली को हवा में उड़ने को! अगर चिड़िया तैरना सीख भी जाए या मछली उड़ना सीख भी जाए, फिर भी वह बेकार है क्योंकि alien environment में खुद को जीवित रख पाना भी मुश्किल है।




Shrawan Singh

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