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गीता दर्शन -10


                               स्वधर्म -1
अपने जीवन में गीता के ज्ञान का holistic application उसे सहजता, सुगमता एवं सामंजस्य से भर देता है। यह जीवन के प्रत्येक क्षण को उसके वातावरण और प्रकृति के साथ इतना natural और coherent कर देता है कि हर activity ब्रह्मांड में चल रहे grand plan के साथ एकाकार हो जाए। मनुष्य और उसके वातावरण का यह एकत्व और एकात्म तभी संभव है, यदि वह अपने स्वधर्म का निष्ठा से पालन करे। यहाँ धर्म का आशय धर्म की प्रचलित व्याख्या (हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई आदि) से बिल्कुल नहीं है, जो धर्म के सामाजिक रूप को प्रदर्शित करता है। स्वधर्म बिल्कुल व्यक्तिगत है; वह प्रत्येक मनुष्य के लिए unique होता है| किसी व्यक्ति का स्वधर्म उसके जीवन का defining manual है , जो केवल उसके जीवन के due opeartions निर्धारित और परिभाषित करता है, किसी और के नहीं! स्वधर्म के अनुसार कर्तव्य पथ पर बने रहने से मनुष्य का सहज रुप मे उत्तरोत्तर विकास होता चला जाता है और वह अपने potential को realise कर लेता है। यह मनुज के बुद्ध बनने की प्रक्रिया का roadmap है।

मनुष्य का स्वधर्म उसके profession से भी defined और described नहीं होता। किसी व्यक्ति का स्वधर्म उसका व्यक्तित्व या जीवन-शैली भी नहीं है, जो समाज के बनाए मापदंडों के आधार पर चलती है। यह देश के कानून, दंड विधान या संविधान के अधिनियमों का संकलन भी नहीं है। यह बुजुर्गों द्वारा बनाए हुए परिवार में चल रहे नियम भी नहीं है। हां इतना जरूर है कि स्वधर्म के पालन का प्रारूप इन ऊपर लिखित factors से affected और shaped जरूर होता है।

स्वधर्म का अर्थ है स्वभाव के अनुसार धर्म या आंतरिक चेतना का धर्म। यह तीनों गुणों - सत् गुण, रजो गुण और तमो गुण का proper admixture के परिणाम का reflection है। किसी व्यक्ति का अंतस, उसका आचार-विचार, उसकी अवचेतना,उसके सोचने का तरीका - यह सब इन्हीं तीनों गुणों के मिश्रण का परिणाम है।
"सत्वं रजस्तम इति गुणा: प्रकृतिसम्भवा: |
निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम् ||"
( the material energy consists of three guṇas (modes)—sattva (goodness), rajas (passion), and tamas (ignorance). These modes bind the eternal soul to the perishable body.)

प्रत्येक व्यक्ति में तीनों गुण विद्यमान होते हैं, यद्यपि इन गुणों की आपेक्षिक मात्रा अलग अलग हो सकती है। 
"रजस्तमश्चाभिभूय सत्वं भवति भारत |
रज: सत्वं तमश्चैव तम: सत्वं रजस्तथा ||"
(Sometimes goodness prevails over passion and ignorance. Sometimes passion dominates goodness and ignorance, and at other times ignorance overcomes goodness and passion.)

इन्हीं तीनों गुणों की आपेक्षिक मात्रा से चारों वर्ण - ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र की अवधारणा का अभ्युदय होता है। श्रीमद्भागवत गीता में कृष्ण इसी बात को इस रूप में कहते हैं-
"चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागश:|"
सत् गुण की प्रधानता ब्राह्मणत्व को परिभाषित करती है और तमोगुण का अधिक्य उसे क्रमोत्तर शूद्र की ओर ले जाता है। चारों वर्णों का यह विभेदीकरण water tight classification नही है , वरन् यह तो एक सांतत्य (continuum) है। एक मनुष्य भी अपने जीवनकाल के विभिन्न समय में अलग-अलग वर्णों को जी रहा होता है। अध्याय 14 में इन विभिन्न अवस्थाओं को पहचानने के yardsticks की व्याख्या की गई है, जिसके आधार पर हम अपने वर्तमान वर्ण का सही-सही आकलन कर सकते हैं।




Shrawan Singh

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