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गीता दर्शन -2

                            

जिंदगी जीने का मैनुअल है श्रीमद भगवदगीता। सब कुछ होने के बाद भी यदि जीवन रूपी मशीन यदि कर्मभूमि में सही से कार्य नहीं कर पा रही है ,तो ऐसे में मैनुअल ही मार्गदर्शन करेगा। आज गुरु भी बेस्ट मिल गए और उन उत्कृष्ट गुरु को उत्कृष्ट शिष्य भी मिल गया, फिर भी जीवन रूपी महाभारत में विभिन्न प्रकार के शकुनियों द्वारा फैलाए गए मायाजाल में कृष्ण शिष्य अर्जुन शिथिल पड़ जा रहा है । इसका कारण जानने के लिए एक बार फिर हम श्री गीता जी रूपी मैनुअल का सहारा लेते हैं। 
"अनभ्यासे विषं शास्त्रमजीर्णे भोजनं विषम् |
दरिद्रस्य विषं गोष्ठी वृद्धस्य तरुणी विषम् ||"
बिना अभ्यास के न जाने कितने श्री कृष्ण जैसे गुरु के अभिमन्यु जैसे शिष्य विषम परिस्थितियों के चक्रव्यूह में फंसकर, मिथ्या आत्म विश्लेषण ,अति आशावाद और अनुभव हीनता जैसे सप्त रथियों द्वारा पराभूत हो जाता है, और महत्वाकांक्षा बढ़ाने वाले भीम नकुल पहले द्वार पर ही कहीं अटक कर रह जाते हैं और जो शिलालेख बनता , वह सिर्फ अखबार बनकर रह जाता है। 
अर्जुन का सिर्फ अर्जुन होना ही पर्याप्त नहीं है। अर्जुन को जरूरत है महाभारत के युद्ध से पूर्व ,विराट युद्ध की। अर्जुन को जरूरत है महाभारत की अग्नि परीक्षा से पूर्व ,भगवान शिव के साथ युद्ध की। आज अभ्यास के लिए शिष्य के पास वक्त की भारी कमी है। आज विभिन्न प्रकार के सोशल मीडिया साइट्स उपलब्ध हैं, जो फुर्सतिये मूर्खों की गोष्ठी का अड्डा बन चुके हैं। आज के अभिमन्यु को इन सब से बचना होगा। आज चुनौती का आलम यह है कि यहां मछली की आंख में तीर मारने का दूसरा अवसर अब नहीं दिया जाता।इसलिए अत्यधिक सजगता और कुशलता से लक्ष्य का संधान और भेदन करना होगा। 
आज के एकलव्य को भी यह समझना होगा कि हर भौंकते कुत्ते पर बाण चलाना बुद्धिमानी नहीं होता । उचित प्लेटफार्म पर देश -काल- परिस्थिति के अनुरूप ही अपने कौशल का प्रदर्शन करें। बिना वजह बिना सोचे समझे हर जगह अपना कौशल जौहर व्यर्थ ना गवाएं। समाज में ऐसे बहुत सारे कुत्ते बिना वजह भौंकते हर जगह फैले हुए मिल जायेंगे। इनसे खुद को बचाकर अपने लक्ष्य पर केंद्रित रहना होगा,अन्यथा श्रेष्ठ होने के नाते आप इतिहास में एक मिसाल के तौर पर अमर तो हो जाएंगे ,किंतु तृप्ति, मानसिक संतुष्टि और जीवन का वह मुकाम नहीं मिलेगा जिसके आप वाजिब हकदार हैं। 
जिस पद के लिए पगार जितना ज्यादा हो उसके लिए साक्षात्कार भी उतना ही कठिन होता है ।आपका लक्ष्य जितना ऊंचा होगा परिश्रम कुर्बानी भी उतनी ही ऊंची होगी। सिर्फ विराट पुत्र उत्तर कुमार हो जाने से ही आपकी प्रतिष्ठा नहीं हो जाएगी। आपको रणक्षेत्र में उतरना ही होगा। वह जमाना और था, जब सारथी का भी रण जीतने पर यश गान होता था। आज दूसरे नंबर वाले को कोई याद नहीं रखता।आपको स्वयं को मजबूत करके खुद ही अपनी लड़ाई जीतनी होगी। आपके बदले कोई अर्जुन युद्ध करने नहीं आएगा।

अपने जीवन में आने वाले हर महाभारत को जीतने के लिए, आपको अपने मन रूपी अश्व को लगाम लगाना ही पड़ेगा और अपने वश में पूर्णतया रखना ही पड़ेगा। तो मन रूपी अश्व को इंद्रिय रूपी लगाम से वश में किजिए और श्री कृष्ण जी द्वारा दिए गए मैनुअल श्रीमद्भगवत गीता के सहारे जीवन की हर महा भारत को जीत लीजिए।


Shrawan Singh

Shrawan Singh

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