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गीता दर्शन -1


जीवन के प्रत्येक कर्म क्षेत्र का विधान है श्रीमद्भगवतगीता | किसी भी कर्म के हर पहलू का संज्ञान है; जीवन युद्ध के पटाक्षेप में वर्णित सर्वश्रेष्ठ गुरु-शिष्य जोड़ी (श्री कृष्ण और अर्जुन) के मध्य रचित और घटित यह गीता | जीवन के किसी भी मोड़ पर, किसी भी क्षण, आप कैसी भी दुविधा में फँस जायें ,घबराने की कोई आवश्यकता नहीं है |बस वेदव्यास रचित ज्ञान की गंगा में पूर्ण समर्पण से डुबकी लगा लें , आपको एक बिल्कुल सीधी सी, पूर्ण प्रकाशित, प्रशस्त राह दिखने लगेगी |अनिर्णय के भंवर-जाल को निर्मित करती हर चक्रियाँ गाँठो से रहित एक मजबूत रस्सी के तंतुओं में बदलती चली जाएगी , जिस को पकड़कर आपको जीवन पथ पर आगे बढ़ जाना है |

शिक्षाविदों ने lecture delivery का सबसे महत्वपूर्ण घटक माना है - उसके end -point को | बड़े से बड़े शिक्षक इस पहलू को लेकर भ्रम और संशय की स्थिति में रहते हैं | lecture की perfect ending गुरु के पूर्ण ज्ञान देने की आत्मिक तुष्टि, शिष्य के ज्ञान प्राप्त करने की पूर्ण संतुष्टि और ज्ञान की आभा के चरमोत्कर्ष के संगम पर होनी चाहिए |

कुरुक्षेत्र में अपने कर्म को लेकर भ्रम,संशय और द्वंद में फंसे अर्जुन को संपूर्ण गीता ज्ञान देने के बाद भगवान श्री कृष्ण ने एक ऐसा संदेश दिया, जो विश्व के सारे शिक्षकों के लिए classroom delivery के अंत मे एक दिशा निर्देश हो सकती है |
इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया |
विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु || ( 18:63 )
(Thus, I have revealed to you this profound and confidential knowledge. Ponder over it deeply, and then do as you wish.)
गुरु ने ज्ञान प्रदान कर शिष्य का विवेक जागृत किया और उसे इस योग्य बनाया कि वह उस ज्ञान के अनुप्रयोग में अपना निर्णय खुद ले सके | शिक्षा की यही सार्थकता है कि वह शिष्य के व्यक्तित्व का विकास कर उसे जीवन की हर कठिनाइयों से स्वयं जूझने का संबल प्रदान करे |

एक उत्कृष्ट शिक्षक की तरह कक्षा समाप्त करने के समय श्री कृष्ण के अंतिम शब्द हैं -
कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा |
कच्चिदज्ञानसम्मोह: प्रनष्टस्ते धनञ्जय || ( 18:72)
( O Arjun, have you heard me with a concentrated mind? Have your ignorance and delusion been destroyed? )
इससे बेहतर ,सटीक और आप्त गुरु-शिष्य संवाद संभव नहीं है, जो गुरु के हृदय से सीधे शिष्य के हृदय तक directly पहुँचती हो|

और किसी ज्ञान के आदान-प्रदान के क्षेत्र में हो रहे गतिविधियों का चरम बिंदु है शिष्य की पूर्ण संतुष्टि | गुरु इसे सत्यापित किए बिना क्लास तो खत्म ही नहीं कर सकता ! और अर्जुन की इस स्पष्ट स्वीकारोक्ति के साथ गीता की यह क्लास खत्म होती है -
नष्टो मोह: स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत |
स्थितोऽस्मि गतसन्देह: करिष्ये वचनं तव || (18:73 )
(O infallible one, by your grace my illusion has been dispelled, and I am situated in knowledge. I am now free from doubts, and I shall act according to your instructions.)

और किसी भी क्लास की सार्थकता भी यही है कि उसकी समाप्ति इसी चरम बिंदु पर हो | तभी सारे शिष्य अर्जुन बन पायेंगे, गुरु योगेश्वर श्रीकृष्ण कहलायेंगे और क्लासरूम ज्ञान के इस युद्ध में जीत को सुनिश्चित करता कुरुक्षेत्र का मैदान बन पाएगा |

Shrawan Singh

Shrawan Singh

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