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गीता दर्शन -9


जीवन को उसकी संपूर्णता की ओर अग्रसर करते गीता-ज्ञान की एक बहुत बड़ी विशेषता है| हर श्लोक की गहराई में गए बिना भी अगर केवल श्रीमद्भागवत गीता के विषय-वस्तु और विषय- विन्यास की बस चर्चा-मात्र ही कर लें, तो भी हमें अद्भुत और जीवनोपयोगी ज्ञान प्राप्त हो जाता है| गीता मनीषियों ने 18 अध्यायों में फैले इसके कथा विस्तार को कर्मयोग, भक्तियोग और ज्ञानयोग आधारित छः-छः अध्यायों में बाँटा है| तर्क को स्थापित करने के लिए ऐसा व्यास (division) विश्लेषण के दृष्टिकोण से तो ठीक है, लेकिन पूरे ग्रंथ में पहले से अंतिम श्लोक तक ज्ञान कर्म और भक्ति की सुम्मिश्रित त्रिवेणी अविरल और अनवरत बहती रहती है और तीनों धाराओं को अलग अलग कर पाना भी दुरूह और अनावश्यक task ही है|

जीवन के किसी भी कर्म-क्षेत्र में सफलता प्राप्त करने का सहज और सुगम पथ भी इसी दिशा की ओर इंगित करता है - कुशलता(ability) एवं अपनत्व(desirability) से परिपूर्ण प्रयत्न(effort)| कार्य करते समय उसे संपादित करने का उचित कार्य कौशल और ज्ञान हो तथा उस कर्म के प्रति भक्ति या प्रेम का समावेश हो जाए, तो काम करने में ही आनंद आने लगता है, थकान की अनुभूति तक नहीं होती और effortlesss, tireless और pleasureable प्रतीत होने वाली सफलता सुनिश्चित हो जाती है|

ऋग्वेद मे भी उधृत है -
" यो जा॒गार॒ तमृच॑: कामयन्ते॒ यो जा॒गार॒ तमु॒ सामा॑नि यन्ति।"
( जो जागा हुआ है, जो प्रयत्नशील है ,वेद उसी की कामना करते हैं और उसी के पास आते हैं |)
जो बिना रुके अपना काम करता रहता है, हर छोटे-मोटे पहलूओं को अपनी जागी आँखों से देखता रहता है, जागृत अवस्था में कर्म की अनुभूत करता है, सच्चा ज्ञान उसी के पास है|और इस अनुभवगत ज्ञान से उस कार्य को करने की कुशलता प्राप्त होती है| श्रीमद्भागवत गीता में भी प्रयत्न और कुशलता के इसी एकरूपता, सामंजस्य और symbiotic relationship पर प्रकाश डाला गया है|
"एकं साङ्ख्यं च योगं च य: पश्यति स पश्यति |"
(those who see jyan yoga and karm yog to be identical, truly see things as they are.)

महाभारत का एक बड़ा ही ज्ञानवर्धक मार्मिक प्रसंग है, जो अपनी योग्यता पर विश्वास रखें हर मानव के मन में बारम्बार आता है | द्रौपदी-स्वयंवर के समय श्रीकृष्ण ने अर्जुन को task पूरा करने के लिए सारा ज्ञान दिया कि तराजू पर पैर संभलकर रखना, अपना body balance maintain रखना, लक्ष्य मछली की आंख पर ही focussed रखना| तो अर्जुन ने पूछा कि सब कुछ अगर मुझे ही करना है, तो फिर आप क्या करोगे? वासुदेव हंसते हुए बोले - 
"मैं वो करूँगा जो तुम नहीं कर सकते! जिस अस्थिर,विचलित, हिलते हुए जल में तुम मछली का प्रतिबिंब देखकर निशाना साधोगे, उस जल को मैं स्थिर रखूँगा|"

कार्य और उसके प्रयोजन के प्रति प्रेम हमारे प्रयत्नों और कुशलता में इसी तरह की सुगम्यता लाता है| प्रेम और अपनत्व कार्य करते वक्त होने वाले कष्टों को सहने की असीम शक्ति देता है| कष्ट गायब नहीं होते; वो रहते तो जरूर हैं, पर वह महसूस नहीं होते ! वह सफलता के पथ पर गतिमान वाहन के नीचे की जमीन समतल कर देता है ; वह इतना पर्याप्त जल उपलब्ध करवा देता है कि नाव का रास्ता रोकने वाले बड़े पत्थर‌ उसमें डूब जायें|

अतएव हमें भी अपने जीवन के हर क्षेत्र में ज्ञान कर्म और भक्ति की इस त्रिवेणी को प्रवाहित करती रहनी है| कार्य के प्रयोजन (purpose) पर पूर्ण आस्था रखते हुए 100% capability और efficiency से अगर हम कोशिश करेंगे, तो थकान भी नहीं महसूस होगी और सफलता तो सुनिश्चित है ही |


Shrawan Singh

Shrawan Singh

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