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गीता दर्शन - 8


मानवीय संबंधों की जैसी subtle और holistic व्याख्या श्रीमद्भागवत गीता में की गई है, वह अन्यत्र किसी भी ग्रंथ में मिलना दुर्लभ है | योगेश्वर श्रीकृष्ण ने किसी भी संबंध में जुड़े दोनों व्यक्तियों और उनके मध्य के सामाजिक आचार -व्यवहार के ताने-बाने को बड़े ही simplified form में प्रस्तुत किया है | संबंधों की जटिलता को समझने के लिए उसके dynamic meachanism को श्रीमद्भागवत गीता के अध्याय 15 में एक poetic metaphor [An inverted tree , ऊर्ध्वमूलम ( upside roots) अध:शाखम (downward branches)] द्वारा दर्शाया गया है | यह उल्टा पेड़ अश्वथम् (temporary) भी है और अव्ययम् (eternal) भी है ; यह सदैव से विद्यमान भी है और नित्य प्रतिदिन इसका रूप बदलता भी रहता है |

वस्तुतः यथार्थ की दुनिया में संबंध का चाहे कोई भी नाम हो, कोई भी व्यक्ति सामने वाले को उसके असली रूप में नहीं देखने की कोशिश नहीं करता , वरन वह उसके प्रतिबिंब को अपने विचारों के जलाशय में देखने मे ज्यादा सहूलियत पाता है | और उस उल्टे आभासी दिख रहे प्रतिबिंब रूपी व्यक्तित्व के आधार पर वह अपनी सारे व्यवहार निर्धारित करता है | वह सामने वाले को जानने की जगह उस प्रतिबिंब के हर हिस्से और कण-कण को जानने की कोशिश करता रहता है और इस प्रक्रिया में प्राप्त धारणा और आकलन को उसके बारे में संपूर्ण ज्ञान समझता है | और मजे की बात यह है कि सामने वाला व्यक्ति भी कुछ ऐसा ही कर रहा होता है ! और यही कारण है कि दुनियावी संबंध अपनी पराकाष्ठा पर नहीं पहुँच पाते और हम उसके खोखलापन का रोना रोते रहते हैं |

समस्याओं की केवल deep-rooted व्याख्या और theoretical deciphering तक ही सीमित रहना गुरु श्रीकृष्ण के शिक्षण-शैली का प्रारूप नहीं रहा है | बल्कि वो तो ऐसे गुरु हैं , जो उसके समूल निदान के लिए शिष्य के साथ कटिबद्ध खड़े रहते हैं | संबंधों को सुदृढ़ करने और उसके खालीपन को भरने के लिए उनकी रणनीति बिल्कुल सरल और अचूक सी है |
"सुविरूढमूल मसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्वा 
तत: पदं तत्परिमार्गितव्यं |"
(that inverted tree must be cut down with a strong axe of detachment. Then one must search out the base of the tree.)

संबंधों को उसके सही रूप में जीने के लिए उन्होंने अर्जुन के माध्यम से पूरे विश्व को एक two-step strategy सिखाई - 
"पहले उस आभासी प्रतिबिंब से नजरें हटाओ और तत्पश्चात उस व्यक्ति के अन्तस/ अंतर्मन में जाकर उसे जानने की कोशिश करो | "

एक अमोघ अस्त्र भी सुझा दिया - 
राग विराग (liking- disliking ) से परे जाकर बिल्कुल स्वच्छ मन से विचार शून्य होकर किसी व्यक्तित्व का आकलन करना |

यदि प्रत्येक relationship से जुड़े दोनों व्यक्ति ठीक इसी तरह अपने सारे पूर्वाग्रहों और अनुभवगत विचारों से स्वतंत्र होकर एक दूसरे के बारे में जानने की कोशिश करें , एक दूसरे के हृदय तक पहुंचने की कोशिश करें, तो सारे संबंध अपनी पराकाष्ठा प्राप्त कर लेंगे और विश्व मानवीय संवेदना के प्रकाश से अलोकित हो जाएगा |
Shrawan Singh

Shrawan Singh

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