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गीता दर्शन -7


जीने की कला का विधान है श्रीमद्भागवत गीता| जीवन का कोई भी पहलू इससे अछूता नहीं बचा है| यह मानवीय जीवन को उसके चरम तक, उसके उत्थान तक पहुंचने का रास्ता बताती है|और किसी को चरमोत्कर्ष पर पहुंचाने के लिए सबसे आवश्यक यह है कि उसे पतन की ओर ले जाने वाले रास्ते से भलीभाँति अवगत करा दिया जाए| 
कुरुक्षेत्र के मैदान में Dilectism के इस basic lesson को Guru -cum-psychologist श्रीकृष्ण ने बड़े ही systematic तरीके से deal किया है | उन्होंने मानव से अमानव बनने की पूरी प्रक्रिया का step by step analysis किया और एक बड़ा ही unique 'पतन की सीढ़ी ( ladder of fall)' का मॉडल प्रस्तुत किया |
"ध्यायतो विषयान्पुंस: सङ्गस्तेषूपजायते |
सङ्गात्सञ्जायते काम: कामात्क्रोधोऽभिजायते ||
क्रोधाद्भवति सम्मोह: सम्मोहात्स्मृतिविभ्रम: |
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति || "
(While contemplating on the objects of the senses, one develops attachment to them. Attachment leads to desire, and from desire arises anger. Anger leads to clouding of judgment, which results in bewilderment of the memory. When the memory is bewildered, the intellect gets destroyed; and when the intellect is destroyed, one is ruined.)

गीता के इन दो श्लोकों मे एक इंसान के पतन की विभिन्न चरणों के बारे मे बिल्कुल सरल सी व्याख्या की गई है | किसी के बारे में भी सोचना आसक्ति को जन्म देता है और उस आसक्ति से उसे प्राप्त करने की, उसे सहेजने की एक इच्छा प्रकट होती है | उस इच्छा के पूर्ण नहीं होने की स्थिति में मन में क्रोध जन्म लेता है और उस क्रोध से सम्मोहन/भ्रम पैदा होता है | भ्रमित इंसान में स्मृति नहीं बचती और और स्मृति के लोप होने से अंततः मानव का विवेक नष्ट हो जाता है | जागृत विवेक ही मानव को मानव बनाता है ; उसे और मानव होने से बचाता है |

जिस तरह नदियों को उनके उद्गम स्थल पर ही आसानी से नियंत्रण में रखा जा सकता है , ठीक उसी तरह अगर हम विषय के ध्यान और उसकी आसक्ति स्तर पर ही यदि अपने विवेक का उपयोग कर लें, तो इस अधोगति से बचा जा सकता है | किसी भी subject को desire बनने के पहले ही अगर उसकी feasibility और utility पर अपने विवेक का उपयोग कर proper contemplation कर लें , तो inevitable descent का process अपने आप रूक जाएगा | और मानव की गरिमा मानव बने रहने में ही है |

Shrawan Singh

Shrawan Singh

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