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गीता दर्शन -6


श्रीमद्भागवत गीता का प्रारंभ मानव-जीवन के एक कटु यथार्थ से हुआ 
है| सु-दृष्टि से वंचित प्रत्येक धृतराष्ट्र(अज्ञान) जीवन के हर पहलू को 'मेरे' और 'पराए' में वर्गीकृत करता रहता है |और इसीलिए उसका मार्गदर्शक चंचल मन रूपी संजय होता है; यथार्थ गुरु कृष्ण से उसका सीधा संवाद नहीं हो पाता |

"धृतराष्ट्र उवाच:
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः |
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय ||"
(Dhritarashtra said: O Sanjay, after gathering on the holy field of Kurukshetra, and desiring to fight, what did my sons and the sons of Pandu do?)

इस दुनिया में एक अलग जीव के रूप में हमारी यात्रा एक शक्तिहीन नवजात शिशु के रूप में प्रारंभ होती है| आँखें खुलते ही हम अपने आसपास के जगत को नएपन और आश्चर्य के साथ देखते हैं| भेदभाव या राग-विराग से रहित यह दृष्टि सभी को एक समान मानती है | नवजात शिशु सभी के साथ comfortable होता है | कोई भी हो, सभी की गोद में आसानी से चला जाता है | पर बड़े होने के साथ-साथ समाज के नियम और मान्यताएं उसे विभिन्न लोगों में भेद करना सिखा देते हैं और उसका आचरण इन्हीं discretions and biased observations पर निर्भर करता है| बड़े होने पर हमारी दृष्टि भ्रामक और भेद कारी हो जाती है| हम एक चश्मा पूरी जिंदगी तक पहने रहते हैं, जिसमें अलग अलग focal length, power और diameter के दो भिन्न लेंस लगे रहते हैं |

छोटा वाला लेंस 'अहं(ego)' से संचालित होता है और उसकी दृष्टि क्षेत्र 'मैं (Me)' तक सीमित होती है | 'ममता ( Extended-ego)' द्वारा संचालित बड़े वाले लेंस का विस्तार क्षेत्र थोड़ा सा व्यापक होता है और उसकी दुनिया 'मेरे (Mine)' द्वारा निर्धारित होती है | लेकिन 'मैं' और 'मेरे' के बीच की सीमा रेखा बड़ी ही undefined और fluid होती है| दरअसल किसी भी व्यक्ति के लिए यह दोनों क्षेत्र एक दूसरे से अजीबोगरीब रूप में गुत्थम-गुत्था होते रहते हैं| इन्ही दोनों दुनियाँ में व्यक्ति 'कर्ता' या 'भोक्ता' के रूप में जीता रहता है |

हम किसी भी घटना या व्यक्ति को इसी bifocal चश्मे से देखते हैं और फिर उसके आधार पर एक धारणा बनाते हैं| लेकिन ऐसी prismatic and discriminatory दृष्टि एक आधी काली ,आधी सफेद दुनिया का निर्माण करती है| एक ओर अच्छाई , विजय, सफलता, लाभ, प्रेम ,सुख,सच्चाई आदि हैं और दूसरी ओर बुराई, पराजय, हानि, घृणा, दुख, झूठ आदि हैं | इसी dichotomous और bipolar रुप से perceived दुनिया को हम अच्छे और बुरे में बाँटने के भीषण द्वन्द्व में फँसे रहते हैं |

चश्मे के दृष्टिक्षेत्र से बाहर एक बहुत बड़ी दुनिया 'पराए (others)' होती है, जिसे हम neutral, detached या dis-interested होकर देखते हैं | यही भाव हमें 'दृष्टा' के रूप में परिणत कर देता है | और यही दृष्टापन अगर हम अपने जीवन के हर पहलू में ले आए, हर संबंधों में आरोपित कर पाएं, तो हम 'समत्व योग ( Yoga of equanimity)' की राह दिखाने वाले गीता ज्ञान के सच्चे अधिकारी बन जाते हैं |
Shrawan Singh

Shrawan Singh

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