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गीता दर्शन -5


श्रीमद्भागवत गीता के ज्ञान की वास्तविकता को समझने की सबसे आरंभिक सीढ़ी है, उसको ग्रहण करने वाले अर्जुन के चरित्र को समझना | आज विश्व के समक्ष भागवत गीता विद्यमान इसीलिए है, क्योंकि महाभारत युद्ध में एक पात्र अर्जुन था |अर्जुन की पात्रता पाए बिना श्रीकृष्ण जैसे गुरु नहीं मिलेंगे और गीता के ज्ञान को कर्म योग में परिवर्तित करने की क्षमता और दक्षता नहीं मिलेगी | और अर्जुन बनना इतना आसान भी नहीं है ; हर कोई उस जैसा व्यक्तित्व बन भी नहीं सकता | युद्ध स्थल पर अपने व्यक्तित्व की दुर्बलता दिखाकर उसने गीता के ज्ञान को और ज्यादा व्यवहारिक बना दिया |

अर्जुन होने का अर्थ है अर्जन करना , हर क्षण नया से नया कुछ सीखते रहने की कोशिश करना | Continuous and active learning आपके skills को अर्जुन के level पर ले जाती है | वह गुरु द्रोणाचार्य के classroom में प्राप्त ज्ञान के revision, re-revision और practice पर ही सीमित नहीं रहा | अंधेरे में आसानी से भोजन कर पाने की साधारण की घटना से प्राप्त अनुभव का अनुप्रयोग उसने अंधेरे में तीर चलाने के अभ्यास से किया , जो कि गुरु ने अभी तक उसे सिखाया ही नहीं था! और इसीलिए गुरु ने अपने पुत्र अश्वत्थामा के अलावा सिर्फ एकमात्र शिष्य अर्जुन को चक्रव्यूह तोड़ने की विद्या सिखाई | महान धनुर्धर साबित होने के बावजूद भी उसने अपने formal स्किल्लस के बाद भी प्रयास कर नए-नए दिव्यास्त्र ( advnced skills) प्राप्त किया |

अर्जुन होने का अर्थ है अनुराग से ओतप्रोत होना, करुणा से लबालब भरा होना | अर्जुन वो है, जो अपने परिवार के प्रति किए गए अनगिनत अन्यायों के बावजूद भी कौरव सेना में अपने रिश्तो को, अपने रिश्तेदारों को ढूँढता है | अपनी विजय को लेकर आश्वस्त होने के बावजूद भी वह उनसे युद्ध करने की जगह सन्यासी बनने तक को तैयार है | उसने अपनी शक्ति का कभी भी अनावश्यक प्रदर्शन नहीं किया; किसी असहाय निर्बल को कभी भी नहीं सताया | अर्जुन वो है ,जो अपने मित्र और गुरु के आगे अपने कमजोर भावों के प्रदर्शन से भी नहीं डरता | अर्जुन वो है, जो किसी अपने के सामने पूर्ण समर्पण कर सकता है |

अपने गुरु के समक्ष उसे यह स्वीकारने में भी कोई हिचक नहीं हुई |
" कार्पण्यदोषोपहतस्वभाव: ,
पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेता: |
यच्छ्रेय: स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे,
शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् || "
(I am confused about my duty, and am besieged with anxiety and faintheartedness. I am your disciple, and am surrendered to you. Please instruct me for certain what is best for me.)

ज्ञान प्राप्ति की साधना के अंतिम चरण में भी उसने अपने शिष्य होने के कर्तव्य को भलीभाँति निभाया | 
" नष्टो मोह: स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत |
स्थितोऽस्मि गतसन्देह: करिष्ये वचनं तव || "
(O infallible one, by your grace my illusion has been dispelled, and I am situated in knowledge. I am now free from doubts, and I shall act according to your instructions.)

अर्जुन वो है,जो अपने परिवार की मुख्य शक्ति होने के बावजूद भी कभी अपना अहंकार प्रदर्शन नहीं करता | वह अपने परिवार के लिए पूर्ण समर्पित है | उसने अपनी मां को यह अधिकार दे रखा है कि उसकी पत्नी को वह सभी भाइयों की संयुक्त पत्नी घोषित कर दे | उसने अपने बड़े भाई को यह अधिकार दे रखा है कि वह उसे दांव पर लगा दे | केंद्र में होने के बावजूद भी वह परिधि के महत्व को नहीं भूलता, जो परिवार को वृहतता और संबल प्रदान करती है |

अर्जुन के व्यक्तित्व में श्रीमद्भागवत गीता में उद्धृत सारे दैवीय गुणों का प्राकट्य दिखता है |
"अभयं सत्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थिति: |
दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम् ||
अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्याग: शान्तिरपैशुनम् |
दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम् || 
तेज: क्षमा धृति: शौचमद्रोहोनातिमानिता |
भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत || "
(these are the saintly virtues of those endowed with a divine nature—fearlessness, purity of mind, steadfastness in spiritual knowledge, charity, control of the senses, performance of sacrifice, study of the sacred books, austerity, and straightforwardness; non-violence, truthfulness, absence of anger, renunciation, peacefulness, restraint from fault-finding, compassion toward all living beings, absence of covetousness, gentleness, modesty, and lack of fickleness; vigor, forgiveness, fortitude, cleanliness, bearing enmity toward none, and absence of vanity.)

इन्हीं गुणों का बाहुल्य किसी व्यक्ति को अर्जुन के स्तर पर ले जाता है और योगेश्वर कृष्ण जैसे गुरु को उसके जीवन में अवतरित लेने के लिए अनुकूल परिस्थितियां बनाता है |



Shrawan Singh

Shrawan Singh

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