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जीजिविषा



मुक्तछंद , अपनी भावनाओं को व्यक्त करने की एक अनूठी काव्य-शैली :-----

जीजिविषा, शायद दिग्भ्रमित !!

सोचता हूँ !
राह मैं जाऊँ किधर ।
जब भी चलता हूँ !
मेरे पाँव रोते हैं ।।
छिल गये हैं ये ,
रिसते ख़ून हैं इनसे ।
क्या पता ? इनसे ही
हासिल एक नया मंज़िल !!
क्या पता ये ख़ून दे दें ,
एक निशान कोई ?
क्या पता इनसे भी ,
मंज़िल पा सके कोई ??
क्या पता कि ये निशान
इतिहास भी लिख दे ?
कौन सोचे अब यहाँ ,
कौन देखे क्या हुआ ??
क्या पता कितने ही होंगे
जो इन निशान से ही ?
ढुँढ लेंगे अपनी मंज़िल,
राह पर चलते !!
क्या पता कितनों को
इससे आसरा मिल जाय ?
हार कर भी चलते रहना,
सीख लें शायद !!
तुष्टि मुझको ये
कि चल रहा हूँ मैं !
मेरा चलना ही मेरे जीवन
का बस कर्तव्य है !!
यही मेरा ध्येय कि
हम चल सकें,बस चल सकें ।
यही केवल लक्ष्य कि
हम जी सकें,बस जी सकें ।।

---- शरत प्रकाश ।।।

Shrawan Singh

Shrawan Singh

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